छुपा रुस्तम विधि जगत

कहानी : नागफनी

 

कहानी : नागफनी 

श्रीमती जया मोहन प्रयागराज

कभी कभी जीवन मे लोग अज्ञानता वश खुद ही नागफनी बो देते है। उन्हीं में से एक मैं यानी रीना हूं।पढ़ी लिखी सुन्दर अच्छे परिवार की बेटी संस्कारी परिवार की बहू। वहाँ भी एकलौती यहाँ भी।
ब्याहकर आयी तो सबका भरपूर प्रेम मिला। मैं भी खुश हो कर सबके मन का करती। माँ जी माँ जी रटती। वो भी मेरा गुण गान करने में कोई कोताही न करती।
मैं एक बेटी,एक बेटे की माँ बनी। दोनों को खूब पढ़ाया बेटी की शादी कर दी।माँ जी बाबू जी लोकवासी हो गए। बस कब मन मे उग आया ये नागफनी जान न पाई। कल्पना करती अपने जैसी बहू लाऊँगी। सारा दिन मेरे पीछे पीछे मम्मी मम्मी जी करती फिरे मैं भी इतराते हुए उसकी तारीफ करू। सब सपने धराशायी हो गए बेटा अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता था। बस लग ही तो गयी मन मे ठेस जबकि लड़की सुन्दर,जॉब वाली थी।पर अड़ना था सो अड़ गए। पति व बेटी ने समझया क्या कमी है मन लो वह बिना बताए विवाह कर लेता तो क्या करती। सबके ज़िद से शादी हो गई सब कुछ ठीक होने पर भी मैं नुक्स निकालती।
मन जो बन गया नही अच्छी। बेटे की ज़िद पर मुम्बई गयी पर कुछ दिनों में लौट आयी। खूब सुनाई पति को देखा एक हम थे माँ जी के बिना कहे सब कर देते एक ये महारानी जिन्हें बोलने तक कि फुरसत नहीं । अरे तुम नौकरी नही करती वो करती है। तुम्हे कोई काम भी तो नहीं था।
हाँ हाँ पक्ष लोगे उसी का।चार -चार काम वाली कभी हमने भी रखी। शाम को तो वही बनातीं थी।बड़ा अहसान करती मेरी बकवास से ये चुप हो जाते।
बेटे का फोन आया पीहू का जन्मदिन पहला है दादी को आना है।चलो तैयारी करो।आप जाओ।क्यो तुम नही जाओगी।नही।बेटी ने सुना कहा क्या माँ आपको जाना जरूर पड़ेगा।चली गई मन मार के।खूब बुराई की बेटी से बहू की पर वो सुनने को तैयार नही।अरे माँ भाभी के पास जितना वक्त होगा उतना देगी न तुम फ़िज़ूल मत सोचो।सब पर जादू कर रखा है।
कार्यक्रम खत्म हो गया मैने कहा चलिए बेटे ने कहा रुकिए बहू बोली माँ जी रहिये हमे भी अच्छा लगेगा।फिर सिर उठा नागफनी का आया नही आ रही इसीलिए रोक रही है क्या पता  नौकरानी को भी न आना हो।न बाबा मैं तो जाऊँगी। मेरी ज़िद पर बेटे ने रिजर्वेशन करा दिया।पर उसी दिन से लॉक डाउन हो गया।मन घबरा गया न जाने कितने दिन रुकना हो।अब तो रहना मज़बूरी है।
बेटा बहू सब घर पर।अब बहु रोज़ तरह तरह का नाश्ता बनाती मुझसे पूछ खाना बनाती।बेटे बहू सब मिलकर कैरम लूडो खेलते।अंत्याक्षरी होती। पीहू भी खूब खुश कहानी सुनती बाबा को घोड़ा बनाती।आज आँख खुली कितनी प्यारी सुघर सुशील है मेरी बहू ।मेरी तरफ करती माँ जी मुझे अपने जैसा खाना बनाना सीखा दीजिये।बहुत सुरीला गाती मेरी बहू उसने मुझसे गीत भजन ढोलक सीखी।सब कुछ चंद दिनों में बदल गया।कितनी मूर्ख थी स्वर्ग से सुख खोए थी।क्यो न सोचा कि बहू के पास जितना समय होगा उतना ही तो देगी।काट दूगीं मन मे उगे इस पौधे को।सच कभी कभी कोई बुराई के पीछे भी अच्छाई होती है ।इस लॉक डाउन ने तो मेरी ज़िंदगी बदल दी।तभी फोन की घंटी बजी बेटी का था मम्मी फ्लैट मिल गया बेटा कैंसिल करवा दो अब मैं इस आनंद को छोड़ कर कही न जाने वाली।वह हँस पड़ी मैं हूं तो आपकी बेटी बुक ही नही कराया। मेरे ठहाके कमरे में गूंज उठे। मन का नागफनी सुख चुका था प्रेम के गुलाब महक रहे थे।

जया मोहन प्रयागराज
09 May 2020