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संबंधों के दायरे में भारत नेपाल

 

सुनील पांडेय : कार्यकारी संपादक

भारत एवं नेपाल दुनिया के दो ऐसे देश हैं जो सामरिक , राजनीतिक, कूटनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि से ना केवल एक दूसरे के सहयोगी ही नहीं अपितु समर्थक भी हैं।दोनों देशों के प्रगाढ़ संबंधों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है दोनों देश एक दूसरे के यहां आने -जाने के लिए ना कोई वीजा और न ही कोई पासपोर्ट की जरूरत होती है। दोनों देश के नागरिक जब एक – दूसरे के देश में आते- जाते हैं तो सीमा पर केवल एक सामान्य औपचारिकताएं ही होती हैं। प्राचीन काल से ही भारत नेपाल का अभिन्न मित्र रहा है ,दोनों देश के मध्य धार्मिक, सामाजिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक समानता भी है। हिंदू धर्म एवं बौद्ध धर्म को मानने वाले अधिकांश लोग दोनों देशों में रहते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार पौराणिक दृष्टि से यदि आकलन करें तो शिव के12 ज्योतिर्लिंगों में एक लिंग नेपाल की राजधानी काठमांडू में है ,जिसे पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। भारतीय एवं नेपाली जनमानस में उस ज्योतिर्लिंग के प्रति अपार आस्था एवं विश्वास है। जहां तक बौद्ध धर्म का संबंध है महात्मा बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी नामक स्थान पर हुआ था और उन्हें निर्वाण भारत के कुशीनगर नामक स्थान पर प्राप्त हुआ। भारत नेपाल को अपना पड़ोसी देश ही नहीं अपितु छोटा भाई मानता है । उसे जब -जब कोई जरूरत होती है चाहे वह आर्थिक हो,सामाजिक हो या राजनीतिक हो सभी तरह की मदद भारत खुले मन से करता है। यहां तक की भारतीय सेना में नेपाली मूल के नागरिकों की भर्ती भी होती है और इसके लिए एक स्पेशल बटालियन गोरखालैंड भी है। इस बटालियन को भारत की सबसे जांबाज एवं बहादुर बटालियनों में एक माना जाता है । जिस पर भारतीय सेना एवं आम नागरिक को गर्व है।

 

हाल ही में भारत और नेपाल के मध्य सीमा को लेकर कुछ विवाद दिखाई दे रहा है जिसका संक्षिप्त अवलोकन आगे किया जा रहा है । जहां तक भारत और नेपाल के मध्य सीमा की बात है दोनों देशों के मध्य लगभग 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा है। इस सीमा के अंतर्गत भारत के 5 राज्य( सिक्किम, पश्चिम बंगाल ,बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड) आते हैं। हाल ही में नेपाल सरकार द्वारा जारी नवीनतम मानचित्र विवाद से पूर्व सीमा को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं था। दोनों देश आपसी सहमति से 98 फ़ीसदी तक सीधी सीमा की पहचान कर उसके नक्शे पर सहमत दे चुके हैं । इसके अलावा कमोबेश जो दोनों देशों के मध्य सीमा का थोडा सा़ विवाद है उसे भी आपसी बातचीत के माध्यम से सुलझाने का प्रयास चल रहा था। दोनों देशों के मध्य हाल ही में विवाद का मूलभूत कारण उत्तराखंड के धारचूला को लिपुलेख दर्रे से जोड़ती एक सड़क है । भारत के पड़ोसी देश नेपाल का दावा है कालापानी के पास पड़ने वाला यह क्षेत्र उसका हिस्सा है और वह हमसे वार्ता किए बिना इस क्षेत्र में सड़क निर्माण का कार्य किया है। हाल ही में नेपाल सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से अपने देश का एक नया मानचित्र जारी किया गया जिसमें उत्तराखंड के कालापानी , लिंपियाधूरा एवं लिपुलेख को अपने संप्रभु क्षेत्र का भू भाग दर्शाया गया है। नेपाल ने अपने दावे की पुष्टि के लिए 1816 में हुई ‘सुगौली संधि’ का जिक्र किया है इस संधि के अनुसार ‘सुगौली संधि’ के तहत काली( महाकाली नदी )के पूर्व के सभी क्षेत्र जिनमें लिंपियाधूरा , कालापानी एवं लिपुलेख शामिल है ,ये सभी नेपाल का अभिन्न अंग हैं। इसी संधि को साक्षी मानकर नेपाली संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव ) ने नए नक्शे से संबंधित बिल पास किया गया है। भारत ने नेपाल सरकार की तरफ से लाए गए इस बिल के पारित होने पर कडे़ शब्दों में आपत्ति दर्ज की है। भारत ने पुनः दोहराया है कि लिपुलेख, काला पानी व लिंपियाधुरा पर नेपाल के दावे के पीछे कोई साक्ष्य नहीं है और नेपाल सरकार सीमा मुद्दे का जानबूझकर राजनीतिकरण कर रही है। इससे भविष्य में दोनों देश के संबंधों में कटुता आने की पूरी उम्मीद है। वैसे हमारा देश भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल से इस सीमा संबंधी मुद्दे का शांतिपूर्ण हल चाहता है।