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हास्य व्यंग : बड़े दिनों के बाद मिली है ये मधुशाला

 

सुनील पांडेय : कार्यकारी संपादक

करोना संक्रमण के चलते भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में 43 दिन बाद जब कल मधुशाला की दुकानें खुली तो इसके कदरदानों की जैसे भीड़ सी लग गई। देखने से तो ऐसा लग रहा था जैसे राशन की दुकान में राशन बंट रहा हो। नजदीक जाने पर एहसास हुआ कि यह मधुशाला के शौकीन लोगों की लंबी -लंबी कतारें हैं। कहीं-कहीं पर फिजिकल डिस्टेंस का तो पूर्णतया पालन होता हुआ नजर आया तो कहीं-कहीं पर फिजिकल डिस्टेंस का भरपूर मजाक उड़ता देखा गया। ऐसे दृश्य को देखकर बरबस ही हरिवंश राय बच्चन के मधुशाला की यह लाइन मुझे याद आ गई –
इस पार प्रिए तुम हो मद है
उस पार न जाने क्या होगा।।

मैंने एक मधुशाला के शौकीन से जब इस पर बात करनी चाही तो उसने बड़े तार्किक ढंग से मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर दिया। उसका कहना था लॉकडाउन में दवा की दुकान तो शुरू से खुली है लेकिन दारू की दुकान क्यों बंद थी। यह उचित नहीं था दवा के साथ दारू एक कॉमन शब्द है जो ज्यादातर हम जैसे लोग एक साथ प्रयोग करते हैं। वर्तमान परिवेश में प्रदेश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को संभालने में दवा से ज्यादा दारू भूमिका निभाती यदि वह खुली होती क्योंकि उससे सरकार को अधिक राजस्व मिलता है। मेरा मानना है की सरकार को दारू के ठेके खोलने का निर्णय शुरू से ही ले लेना चाहिए था। इतना देर करने से अर्थव्यवस्था का कितना भारी नुकसान हुआ। चलो देर हुआ दुरुस्त हुआ हम इसी बात से संतुष्ट हैं । आखिर संकट की घड़ी में हम जैसे लोग भी सरकार का कुछ हाथ बटाएं यह कार्य हम जैसे पीने पिलाने के शौकीन लोग शराब खरीद कर ही सकते हैं। हम सब पीएम केयर फंड या मुख्यमंत्री राहत कोष में प्रत्यक्ष कोई आर्थिक मदद तो नहीं कर सकते लेकिन इस शराब की खरीद के द्वारा तो अपना अमूल्य योगदान तो दे ही सकते हैं। मेरी नजर में दवा और दारू जिंदगी की दो आवश्यक आवश्यकता है । मैं तो दोनों को बराबर मानता हूं,यदि एक जीवन रक्षक है तो दूजी जीवन को सुकून देने वाली है। शरीर का दर्द यदि दवा से दूर होता है तो दिल का दर्द दारू से दूर होता है। उसने मुझे एक गीत भी सुनाया जो मैं शब्दसः लिख रहा हूं –
मंदिर मस्जिद दोनों को
बस प्रेम सिखाती मधुशाला ।।
यह तो हम जैसों के लिए है
जैसे कोई सुधा का प्याला।।
जब कोई इसको पीता है
बन जाता है मतवाला ।।
उसके जैसे कोई नहीं है
इस जग में हिम्मतवाला।।
पीकर जबवो गीत है गाता
उसके मन को ही वह भाता ।। ऐसा है वो मदमस्त निराला
पीता है जब वह मधु का प्याला।। राग द्वेष सब भूल कर वो
बन जाता है सब का रखवाला।। मंदिर मस्जिद दोनों को
बस प्रेम सिखाती मधुशाला।।

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