Bihar news राष्ट्रीय एकता धर्मनिरपेक्षता और सम्प्रदायिक सद्भाव के मिसाल मरहूम अब्दुल कय्यूम अंसारी साहब के मौसम पैदाइश पर खेराज ए अकीदत – इन्तेखाब आलम

Bihar news Kheraz-e-Aqidat on the birth of the late Abdul Qayyum Ansari Sahab, an example of national unity, secularism and communal harmony - Intekhab Alam
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मंटू राय संवाददाता अररिया

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य इन्तेखाब आलम ने देश के महान सपूत स्वतंत्रता आंदोलन प्रखर सेनानी मरहूम अब्दुल कय्यूम अंसारी साहब के 116वीं योमे पैदाइश पर खेराज ए अकीदत पेश करते हैं।
इन्होंने कहा कि आज ही दिन उनके नाम पर डाक टिकट जारी हुआ।
इन्होंने कहा कि स्व अब्दुल कय्यूम अंसारी साहब डेहरी ऑन सोन में 1जुलाई 1905 में जन्म लेने वाले वह हस्ती है क्षजिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के टू नेशन थ्योरी का डटकर विरोध किया था और गांधी जी और उनकी टीम से उन्होंने भारत को विभाजित न करने की बात कही थी।उसके बाद ही देश में कई मुस्लिम नेताओं ने जिन्ना के द्विराष्ट्र वाद सिद्धांत की मुखालिफत की वह भारत की आजादी के लिए महज 16साल की उम्र में जेल गए।
इन्होंने कहा कि मरहूम अब्दुल कय्यूम अंसारी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और छात्र जीवन से ही उन्होंने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र वाद के सिद्धांत का विरोध करना आरम्भ कर दिया था और प्रारम्भिक शिक्षा सासाराम व डेहरी ऑन सोन के स्कूलों से ग्रहण की इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, कोलकाता विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण उनकी शिक्षा बाधित होती रही।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आह्वान पर उन्होंने सरकारी स्कूलों का बहिष्कार किया था। श्री आलम ने कहा कि साइमन कमीशन का विरोध युवा नेता के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ कर 1928में कोलकाता में साइमन कमीशन के खिलाफ छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया और अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग और खिलाफत आंदोलन में शामिल होने के कारण 16वर्ष की उम्र में गिरफ्तार कर उन्हें जेल डाल दिया गया था।उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर बिहार से असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया।
इन्होंने कहा कि 1940में उन्होंने मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीतियों व पाकिस्तान की मांग का कड़ा विरोध किया था और 1942 में उन्होंने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया तथा1947में भारत के बंटवारे की शिद्दत से मुखालिफत करते हुए मुसलमानों से अपील की कि अपना वतन भारत छोड़ कर पाकिस्तान न जाएं,वह भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे।
इन्होंने कहा कि मरहूम
अब्दुल कय्यूम अंसारी ने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों और मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति के विरोध स्वरूप 1937-38में मोमिन कान्फ्रेंस की स्थापना की जिसने कांग्रेस के साथ देश की आजादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन्होंने कहा कि 1946में बिहार प्रोविंशियल असेंबली में मुस्लिम लीग के खिलाफ अब्दुल कय्यूम अंसारी सहित छह मोमिन कांफ्रेंस के उम्मीदवार चुनाव जीत कर आए.श्रीबाबू के नेतृत्व में सरकार बनी तो कय्यूम अंसारी भी काबीना मंत्री बने, वे17वर्षों तक बिहार में मंत्री रहे।बाद में मोमिन कान्फ्रेंस को एक राजनीतिक संस्था के रूप में भंग कर दिया और इसे एक सामाजिक और आर्थिक संगठन बना दिया उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से पिछड़े मोमिन समुदाय के उत्थान के लिए काम किया।
इन्होंने कहा कि बैकवर्ड क्लासेस कमीशन का गठन कर 1953में उन्होंने ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लासेस कमीशन का गठन करवाया जो वाकई एक बड़ा कदम था उन्होंने हमेशा देश के कमजोर वर्गों के उत्थान केलिए काम किया और वह बुनकर समुदायों के आर्थिक कल्याण और देश के कपड़ा उद्योग में हथकरघा के विकास के लिए भी प्रयासरत रहे.आज ही के दिन 2005में भारतीय डाक सेवा द्वारा उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया.18जनवरी 1973को इस महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया.अब्दुल कय्यूम अंसारी एक कुशल पत्रकार, लेखक और कवि भी थे।
इन्होंने कहा कि वह पूर्ववर्ती दिनों में उर्दू साप्ताहिक “अल-इस्लाह” (सुधार) और एक उर्दू मासिक “मसावात” (समानता) के संपादक थे. जिनके द्वारा उन्होंने सामाजिक सुधार आंदोलन चलाए. उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय विषयों का काफी ज्ञान था।उन्हें राष्ट्रीय एकता,धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है।

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