संवाददाता: मोहन सिंह
बेतिया, पश्चिमी चंपारण
पश्चिमी चंपारण । चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर पश्चिम चंपारण जिले के रामनगर प्रखंड अंतर्गत स्थित सोमेश्वर पहाड़ियों पर काली माता मंदिर में दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
भारत-नेपाल सीमा के निकट स्थित यह धार्मिक स्थल वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के बीच स्थित है, जहां पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए एक कठिन लेकिन आस्था से भरी यात्रा होती है।

करीब 880 मीटर (2,884 फीट) की ऊंचाई पर शिवालिक पर्वतमाला में स्थित सोमेश्वर शिखर बिहार के सबसे ऊंचे स्थानों में गिना जाता है। यहां प्राचीन काली मंदिर और ऐतिहासिक सोमेश्वर किला स्थित है। हर वर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
यात्रा की शुरुआत रामनगर से गोवर्धन गांव तक लगभग 16 किलोमीटर की सड़क यात्रा से होती है, जिसके बाद करीब 12 किलोमीटर की कठिन पहाड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है। यह यात्रा घने जंगलों, नदियों और खड़ी ढलानों से होकर गुजरती है और इसे पूरा करने में लगभग 5 से 6 घंटे का समय लगता है।
रास्ते में परेवाड़ाह, वनेश्वर झील और नाचन चिड़िया पहाड़ी जैसे प्राकृतिक स्थल श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं, जबकि धमाहवा पहाड़ी की खड़ी चढ़ाई उनकी सहनशक्ति की परीक्षा लेती है।
श्रद्धालु निरंजन प्रसाद ने बताया, “रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन आस्था अटूट है। शिखर पर पहुंचकर मिलने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा इस यात्रा को सफल बना देती है।”
चढ़ाई शुरू करने से पहले श्रद्धालु गोवर्धन गांव में बाबा नरहरी दास की प्रतिमा के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि करीब तीन दशक पहले बाबा नरहरी दास ने यहां धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत की थी।
स्थानीय श्रद्धालु हरिओम प्रसाद के अनुसार, यह स्थल 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। नवरात्र के दौरान थारू समुदाय और स्थानीय ग्रामीण श्रद्धालुओं के लिए पानी, भोजन और भंडारे की व्यवस्था करते हैं।
नवरात्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था सशस्त्र सीमा बल (SSB) की 65वीं बटालियन, स्थानीय पुलिस और वन विभाग की टीमों द्वारा संभाली जा रही है। कमांडेंट नंदन सिंह मेहरा ने बताया कि श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध कराई गई है। सोमवार को चढ़ाई के दौरान घायल हुए कई श्रद्धालुओं का उपचार SSB टीम द्वारा किया गया।
पश्चिम चंपारण के सांसद सुनील कुमार ने बताया कि इस स्थल को धार्मिक और इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यहां रोपवे और बुनियादी सुविधाओं के विकास की मांग की गई है, जिससे श्रद्धालुओं की यात्रा अधिक सुरक्षित और सुगम हो सके।