मजदूर का क्या है, वह मजबूर है, क्योंकि इंसानियत मर चुकी है 

IMG_20200515_131859
Share News

 

मनोज कुमार राजौरिया :   कभी-कभी मुझे लगता है इंसानियत मर चुकी है, कल से एक वीडियो ने मुझे परेशान कर रखा है, जब भी देखता हूँ तभी जिंदगी के मायने बदल जाते हैं। इस कोरोना ने हमे बहुत कुछ सिखा भी दिया और तो और हमारी सरकारों की नीतियों को साफ साफ दिखा भी दिया। सबका साथ सबका विकास से शुरू हुई सरकार आज अमीरो की हितैषी एक दम साफ नजर आती है, क्योंकि गरीब मजदूर है और वो मजबूर है।

IMG 20200515 131859

सरकार की नीतियों का पुरजोर खण्ड़न करता एक मार्मिक वीडियो की कहानी- जिसमे एक मजदूर परिवार बैलगाड़ी पर बैठकर अपने गांव जा रहा है, नही-नही वो केवल बैलगाड़ी नही बल्कि इंसान गाड़ी भी है। बारी-बारी बैल के साथ परिवार के सदस्य उसे खिंच रहे हैं। लॉक  डाउन के चलते पूरा देश बन्द है, ऐसी तालाबंदी में रोजगार ना होने के चलते प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या अपने घर-गांव के लिए पैदल ही कूच रहे हैं। क्योंकि सरकारें इन प्रवासी बेरोजगार मजदुरो में अब भी अपनी कमाई देख रही है।
कोई सड़क पर हजारों किलोमीटर पैदल चल रहा है तो कोई रेल की पटरियों का सहारा ले रहा है, वो बात अलग है कि कभी रेल की पटरियों पर मजदूर अपनी जान गवां दे रहे हैं तो कभी सड़क पर मजदूरों को ट्रक कुचल जा रहा है, क्योंकि सुरक्षा तो सिर्फ उनके लिए है जो देश से बाहर है जो देश मे है वो सरकार की नजर में पहले ही सुरक्षित है, क्योंकि मदुर का क्या है, वह मजबूर है।
मेरा अनुमान है कोरोना से देशभर में हुई मौतों का कुल आंकड़ा सड़क और ट्रेन हादसों में हुई मौतों से कम ही होगा।
मजदूर का क्या है, वह मजबूर है 
मध्यप्रदेश के इंदौर बाईपास से राहुल अपने घर के लिए बैलगाड़ी से अपने गांव वापस जा रहा है। माफी कीजियेगा फिर एकबार मुझसे गलती हो गयी, असल मे राहुल अपने परिवार को बैलगाड़ी में लिए खुद बैल की भांति, बैल के साथ अपने परिवार को खींच रहा था, कभी राहुल बैल के साथ परिवार को खिंचता है, कभी राहुल की माँ, कभी राहुल के पिता।

यह दृश्य भयावह था, दिल को झंजोड देने वाला था। जब राहुल से यह पूछा कि आप खुद बैलगाड़ी को क्यों खिंच रहे हो तो राहुल का जवाब इंसानियत पर सवाल खड़े करने वाला था। राहुल ने कहा कि मेरा परिवार काफी समय से बैलगाड़ी से सफर कर रहा है, रास्ते मे पेट भरने के लिए खाने की जरूरत होती है। खाने के लिए पैसों की जरूरत होती है।
जब मेरे परिवार पर खाने के लिए कुछ नही बचा तो हमने हमारा एक बैल जिसकी कीमत 25 हज़ार रुपये थी उसे 5 हज़ार में बेच दिया जिससे हमारा परिवार गुजर-बसर कर सकें,
एक किसान मजदूर परिवार के लिए बैल उतना ही मायने रखता है जितना नौकरी-पेसा व्यक्ति के लिए उसकी नौकरी, जब उसकी नौकरी जाती है तो उसका दर्द वही जानता है।

राहुल के परिवार के भरण-पोषण करने वाले बैल को मात्र 5 हज़ार रुपये में खरीदने वाले व्यक्ति की मानसिकता को आप समझ सकते हैं, उस एक व्यक्ति जिसने वो बैल खरीदा उसकी मानसिकता ओर इंसानियत ने हमारे समाज की इंसानियत पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया?
अगर वही व्यक्ति उसका बैल ना खरीदकर उस परिवार को 10-15 किलो आटे के साथ जरूरी खाने की सामग्री देता तो आज राहुल के पास उसका बैल होता, उसके परिवार को पालने का सहारा होता।
किसी गरीब मजदूर की मजबूरी का फायदा उठाकर इंसानियत को शर्मशार करने वाला यह कृत्य दिल दहलाने वाला है, दुःखी हूँ क्योंकि आज इंसानियत वेंटिलेटर पर है।
इसीलिए मजदूर का क्या वह मजबूर है, क्योंकि आज हमारे समाज की इंसानियत उस बैल खरीदने वाले व्यक्ति की वजह से वेंटिलेटर पर है।

Trending News