Uttar Pradesh : यूपी में चाचा भतीजे के बीच सुलह में अब कौन बन रहा है रोड़ा,खुद शिवपाल ने किया खुलासा

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मनोज कुमार राजौरिया । मुलायम सिंह यादव का परिवार सुलह की राह पर तो कब का चल पड़ा है, लेकिन अभी भी कुछ बाधाएं हैं जो चाचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव को राजनीतिक रूप से एक होने रोड़े अटका रही हैं।

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दोनों के बीच मध्यस्थता की भूमिका खुद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने निभानी शुरू की थी, जब वे बीमार होकर लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती थे। वैसे दोनों के बीच की आपसी दूरियां इस साल होली से ही मिटनी शुरू हो गई थीं, जब मुलायम परिवार के सारे लोग अपने पैतृक गांव सैफई में इकट्ठा हुए थे। उसके बाद दोनों ओर से इस तरह के कई पहल हुए हैं, जिससे विवादों को खत्म करने में काफी हद तक मदद मिली है। लेकिन, दोनों फिर से एक नई राजनीतिक धारा के सूत्रधार बनते उससे पहले उनके सामने एक नई चुनौती आ गई है और अब वे फिलहाल उस आफत के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं।

 

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◆ शिवपाल ने कहा है कि ‘जब याचिका वापस ले ली गई थी तो उन्हें धन्यवाद करना मेरी जिम्मेदारी बनती थी।’ इसके बाद उन्होंने भविष्य की राजनीति के मद्देनजर अपने मन में पल रहे मंसूबे को लेकर कहा कि, ‘मैं काफी वक्त से कह रहा हूं की सभी समाजवादी ताकतों को 2022 की लड़ाई से पहले एकजुट होना होगा।’ पार्टी सूत्रों के मुताबिक दोनों के बीच सुलह की संभावनाएं तब परवान चढ़ने लगीं जब लखनऊ में अपने बीमार भाई और सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को देखने शिवपाल यादव अस्पताल पहुंचे थे। वहीं पर उनकी मुलाकात भतीजे अखिलेश और बहू डिंपल यादव से हुई थी। जानकारी के मुताबिक उसी दौरान मुलायम ने चाचा-भतीजे के बीच मध्यस्थता की पहल शुरू की। हालांकि, इसकी शुरुआत इस साल होने में ही हो गई थी। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के मुखिया शिवपाल सिंह यादव ने अपने भतीजे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ दोनों दलों के बीच राजनीतिक संवाद की अटकलों पर आखिरकार विराम लगा दिया है। उन्होंने कहा है कि वो इस संबंध में अखिलेश से बात करेंगे। भतीजे के लिए चाचा के रुख में नरमी तब आई है जब समाजवादी पार्टी ने जसवंतनगर विधानसभा सीट से उनकी विधायकी रद्द करने वाली यूपी के स्पीकर के पास दी हुई याचिका वापस ले ली है। शिवपाल ने 2018 में पीएसपीएल बनाने के लिए समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी, इसी आधार पर सपा ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की याचिका दी थी। स्पीकर द्वार याचिका वापस किए जाने के बाद ही शिवपाल ने अखिलेश को खत लिखकर उन्हें धन्यवाद भी दिया था और भतीजे के नेतृत्व में यूपी में एक नए राजनीतिक विकल्प की शुरुआत होने की अपनी ओर से एक भावना भी व्यक्त की थी।

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◆ कोरोना बन रहा है आगे की बातचीत में रोड़ा मतलब साफ है कि जिस राजनीतिक मंसूबों को लेकर चाचा और भतीजा अलग हुए थे, उसमें दोनों ही मात खा चुके हैं। जाहिर है कि बदली हुई परिस्थितियों में साथ में मिलकर चलना दोनों की पारिवारिक और राजनीतिक मजबूरी भी है। तैयारियां 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर करनी है। इसलिए शायद शिवपाल चाहते हैं कि बाकी की औपचारिकताएं भी जल्द पूरी कर ली जाएं। लेकिन, इस समय में चाचा-भतीजे को साथ आने में सबसे बड़ा रोड़ा कोरोना बन गया है।

◆ खुद शिवपाल यादव का भी यही कहना है, ‘महामारी से निपटना बहुत ही बड़ी चुनौती है। जब महामारी खत्म हो जाएगी तभी हम बातचीत को और आगे बढ़ा पाएंगे। हम एक ही परिवार हैं और हम बैठकें करते रहेंगे।’
हालांकि, उन्होंने अभी तक ये पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ अपने दल का विलय करना चाहते हैं या उनकी आपसी गठबंधन की योजना है।

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