विचार प्रवाह : जिस देश का अनाज भंडार 3 गुना ज्यादा भरा है वहां भूख से एक मां क्यों मर जाती है ?

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विचार प्रवाह  : मनोज कुमार राजौरिया

इससे ज्यादा बर्बर समाज दूसरा नहीं हो सकता, जहां कोई भूख से दम तोड़ दे. लेकिन रोज दर्जनों लोग भूख के ब्लैक होल में समा रहे हैं. बड़ी ही असहनीय पीड़ा उस वक़्त हुई जब पता लगा कि एक मां रेलवे स्टेशन पर पड़ी है. दम निकल चुका है. उसका जरा सा बच्चा मां को जगाने की कोशिश कर रहा है. उस अबोध बच्चे को नहीं पता है कि उसकी माँ मर चुकी, या यूं कह दो की सरकारी सिस्टम(तंत्र) ने मार दी, अब कभी नहीं जागेगी.

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इसके अलावा न जाने कितने मजबूर मजदूर भाई बहनें अनियमिता में मौत के काल मे समा गए, अगर कोई ठोस नियम सरकार और देशो से देख कर करती तो देश मे इस त्रासदी के दौर में इस तरह इंसान सड़को और स्टेशनों पर भूख प्यास और दुर्घटनाओं से काल के मुँह में ना समता।
लेकिन हम आप तो जाग सकते हैं. जनता तो जाग सकती है. जो जिंदा बचे हैं वे जाग सकते हैं. वे जाग जाएं तो कम से कम यह पूछना शुरू कर दें कि जिस देश का अनाज भंडार हमने जरूरत से तीन गुना ज्यादा भर दिया है, वहां हमें ही भूख से क्यों मारा जा रहा है?

बच्चे की मां मर चुकी है. वह अब नहीं जाग सकती. लेकिन जनता की सोई हुई चेतना यकीनन जाग सकती है. मेरी औकात और हैसियत उतनी ही है जितनी उस बच्चे की है, लेकिन जनता की औकात उस मर चुकी मां से बहुत ज्यादा है. इतनी ज्यादा कि आगे से कोई मां भूख से स्टेशन पर दम न तोड़ दे.
हे जनता जनार्दन! आप जालिमों की गुलामी से बाहर क्यों नहीं आना चाहते?

एक बात तो सत्य है कि-
Corona did not break the system,
Corona exposed a broken system.

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