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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष : बुद्धं शरणंम गच्छामि 

जनवाद टाइम्स 7 May 2020
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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष : कार्यकारी संपादक सुनील पांडेय

बुद्धं शरणंम गच्छामि 

भारत विभिन्न धर्मों की जन्म स्थली रही है ।उन्हीं धर्मों में एक लोकप्रिय धर्म बौद्ध धर्म भी है। जिसका प्रवर्तक महात्मा बुद्ध को माना जाता है। महात्मा बुद्ध का धर्म अत्यंत व्यावहारिक था वह मनुष्य के चरमोत्कर्ष का पूर्ण साधन था। वह इहलोक में और परलोक में संपूर्ण मान्यताओं का मापदंड था। महात्मा बुद्ध ने स्वयं ही धर्म की अवश्यकता और महत्ता पर अनेक स्थानों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनकी दृष्टि में धर्म ही मानव में श्रेष्ठ है ,इस जन्म में भी और पर जन्म मैं भी। वह जीवन का विषय है मृत्यु का नहीं। अनेकानेक अन्य धर्मों के प्रतिकूल वह इसी जीवन में निर्वाण दिलाता है। बौद्ध धर्म भारत का ही नहीं अपितु विश्व के महान् धर्मों में एक है ।बौद्ध धर्म की उत्पत्ति एकाएक नहीं हुई वरन् युग युग के पूँजीभूत विश्वासों के सत्यान्वेषण का प्रतिफल है ।यह धर्म ऐस काल में उद्भूत हुआ जिसमें मनुष्य की जिज्ञासा युग युग के पूँजीभूत विश्वासों के और उनको चीरकर प्रत्येक वस्तु के अंतस्थल को देखना चाहती थी। मनुष्य की उद्भूत तर्कशीलता एवं सत्यान्वेषणी दृष्टि के समक्ष प्राचीनता एवं अंधविश्वास कांप रहे थे, कर्मकांड की विशाल दिवारें जर्जरित हो रही थीं
और अंधविश्वास के आधार पर संरोपित पुरातन मान्यताएं अपने जीवन के प्रति निराशा ही दिखाई देने लगी थी ।यह सत्य है बौद्ध धर्म ब्राह्मण धर्म के घोर कर्मकांड की बलवती प्रक्रिया थी।

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महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित वर्णन बौद्ध साहित्य में मिलता है। बौद्ध साहित्य के अनुसार महात्मा बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के समीप लुंबिनी वन में हुआ था। उनकी पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य के प्रधान थे ।उनकी माता का नाम माया देवी था जो कोलिय गणराज्य की कन्या थी। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद उनकी माता माया का देहांत हो गया तथा उनका पालन पोषण उनकी विमाता (मौसी )प्रजापति गौतमी ने किया। बचपन से ही उनका मन राजकीय ऐश्वर्य एवं वैभव में नहीं लगा । वह एकांत स्थान पर बैठकर जीवन ,मरण ,सुख एवं दुःख आदि समस्याओं के ऊपर गंभीरतापूर्वक मनन किया करते थे। इस प्रकार के सांसारिक जीवन से विरक्त होते देखकर उनके पिता ने 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा के साथ कर दिया। यशोधरा से सिद्धार्थ को एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम राहुल था। वैवाहिक बंधन भी उन्हें उनके उद्देश्य नहीं रोक सका । 29 वर्ष की आयु में एक रात अपनी पत्नी और पुत्र को सोता छोड़कर घर को त्याग दिया । बौद्ध ग्रंथों में इसे ‘महाभिनिष्क्रमण ‘की संज्ञा दी गई है । इसके पश्चात ज्ञान की खोज में वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने लगे। उन्होंने कई स्थानों पर तपस्या की लेकिन उन्हें पूर्ण संतोष नहीं प्राप्त हुआ। कालांतर में 6 वर्षों की साधना की पश्चात 35 वर्ष की अवस्था में आज के ही दिन वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्त हुई। अब उन्होंने दुःख तथा उसके कारणों का पता लगा लिया । इस समय से वे भगवान बुद्ध के नाम से विख्यात हुए। इसके बाद बुद्ध सत्य अहिंसा प्रेम विश्व बंधुत्व इत्यादि उपदेशों का प्रचार प्रसार करने लगे। गया में सर्वप्रथम उन्होंने दो बंजारों को उपदेश देकर अपना अनुयाई बनाया। इसके बाद वे सारनाथ पहुंचे । वहां पर उन्होंने 5 तपस्वीयों को दीक्षा दी जिन्होंने पहले उनका साथ छोड़ दिया था। यह पांच तपस्वी पुनः उनके शिष्य हो गए। इस घटना को ‘धर्मचक्र प्रवर्तन ‘कहा जाता है।

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महात्मा बुद्ध के उपदेश सरल व्यावहारिक और जन भाषा में थे इसलिए वे अत्यंत लोकप्रिय हुए। उन्होंने जीवन की शादगी पर बल दिया तथा वैदिक कर्मकांडों का घोर विरोध किया। वह जाति-पांत के भेदभाव को नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने बिना भेदभाव के सभी इच्छुक व्यक्तियों को बौद्ध धर्म का सदस्य बनाया । वह बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। बौद्ध धर्म का आधार स्तंभ है बुद्ध, धम्म अर्थात धर्म, और संघ।
महात्मा बुद्ध ने 4 आर्य सत्यों का उपदेश दिया है जिनके नाम है 1. दुःख ,2. दुःख समुदय3. दुःख निरोध और 4. दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा। महात्मा बुद्ध ने बताया दु:ख से छुटकारा पाने पर निर्वाण प्राप्त होता है तथा जन्म मरण से छुटकारा मिल जाता है। इसके लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। अष्टांगिक मार्ग में 8 बातें शामिल थी 1. सम्यक दृष्टि 2.सम्यक संकल्प 3.सम्यक वाक 4.सम्यक कर्म 4.सम्यक अजीव 6. सम्यक व्यायाम 7. सम्यक् स्मृति एवं 8.सम्यक समाधि। उन्होंने मध्यम मार्ग का अनुसरण करने पर जोर दिया। लोगों को अतिव्यसन तथा अति तपस्या करने से मना किया। उन्होंने 10 शील और द्वादश निदान का भी उल्लेख किया। उनके द्वारा बताए गए 10 शील के नाम इस प्रकार हैं -1. अहिंसा2. अस्तेय 3.सत्य4. अपरिग्रह 5.ब्रह्मचर्य 6.नृत्य गान का त्याग 7.सुगंधित पदार्थों का त्याग 8.असमय भोजन का त्याग 9.कोमल सैय्या का त्याग10. कामिनी कंचन का त्याग। इनमें से प्रथम पांच सबके लिए आवश्यक हैं जिसे ‘पंचशील’ कहा जाता है और अंतिम पांच केवल बौद्ध भिक्षु के लिए । इस तरह महात्मा बुद्ध ने सदाचार को
निर्वाण का सोपान बताया । बुद्ध का परम उद्देश्य निर्वाण है। यह तभी संभव है जब मनुष्य की तृष्णा का अंत हो जाएगा। निर्वाण की प्राप्ति से मनुष्य जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है, जिस प्रकार पार चले जाने से मनुष्य के नाव की आवश्यकता नहीं रहती उसी प्रकार मनुष्य को धर्म की आवश्यकता नहीं पड़ती।
महात्मा बुध अपने समग्र जीवन काल में अपने धर्म का प्रचार प्रसार करते रहे । 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनारा ( कुशीनगर)में 483 ईसा पूर्व में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। बोद्ध धर्म में इसे ‘महापरिनिर्वाण’ की संज्ञा दी जाती है।
महात्मा बुद्ध का समस्त सिद्धांत
एवं उपदेश मानव जाति के कल्याण हेतु है ।विदेशी विद्वान मैक्समूलर महोदय लिखते हैं कि-” संसार के समस्त धर्मों में बौद्ध धर्म ऐसा धर्म है जो अपनी पवित्रता और शुद्धता के कारण प्रत्येक व्यक्ति द्वारा प्रशंशित किया गया है।” यह सर्वथा सत्य है बौद्ध धर्म का श्रीगणेश मात्र वैदिक धर्म के दोषों का निराकरण करना था ।लोग यज्ञों तथा बलि के बाह्य आडंबर से क्षुब्ध हो चुके थे ।मानव को एक ऐसे धर्म की आवश्यकता थी जिसमें जाति-पांति छुआछूत बाह्य आडंबर तथा अंधविश्वास की बू तक ना हो ।बौद्ध धर्म ऐसा ही धर्म था जो वैदिक कर्मकांड को दूर करके समस्त मानव हित के लिए उत्पन्न हुआ था इसी कारण बौद्ध धर्म भारत में ही नहीं विश्व का एक प्रमुख लोकप्रिय धर्म बन गया। यह विडंबना ही है इस धर्म के मानने वाले बहुत से लोग आज भी मांसाहार का प्रयोग करते हैं जो मेरे दृष्टिकोण से सही नहीं है। यदि हमें बौद्ध धर्म को आत्मसात करना है तो मांसाहार का पूर्णतया त्याग करना होगा यही महात्मा बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रति सच्ची निष्ठा होगी। अंत में बौद्ध धर्म के त्रित्नों के साथ मैं अपने शब्दों को विराम देता हूं-
बुद्धं शरणं गच्छामि ।
धम्मंशरणं गच्छामि ।
संघं शरणं गच्छामि ।

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