आगरा। भारतीय संस्कृति में शिक्षा को सदैव ज्ञान, संस्कार और समाज निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों तक भारत ने शिक्षा को सेवा और लोककल्याण का साधन माना। लेकिन बदलते समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज अनेक शिक्षण संस्थानों में ज्ञान से अधिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दिए जाने की प्रवृत्ति गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के डिप्टी नोडल अधिकारी (MyGov) डॉ. प्रमोद कुमार ने अपने विचार लेख “शिक्षितों द्वारा शिक्षा का व्यापार: समाज के लिए एक गंभीर चुनौती” में शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण और उसके सामाजिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण किया है।

डॉ. प्रमोद कुमार लिखते हैं कि भारतरत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर का संदेश “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” तथा स्वामी विवेकानंद के शिक्षा संबंधी विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके अनुसार शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या रोजगार पाने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण का आधार है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा देना और शिक्षा का व्यापार करना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। शिक्षा एक सामाजिक और नैतिक दायित्व है, जबकि व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना होता है। जब शिक्षा में भी लाभ कमाने की मानसिकता हावी हो जाती है तो उसका मूल उद्देश्य प्रभावित होने लगता है।
लेख में कहा गया है कि आज कई निजी विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और कोचिंग संस्थान शिक्षा को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। आकर्षक विज्ञापन, ऊँची फीस, बेहतर परिणामों के बड़े-बड़े दावे और रोजगार के नाम पर प्रचार शिक्षा के बाजारीकरण की पहचान बनते जा रहे हैं। इससे विद्यार्थी ज्ञान के साधक के बजाय ग्राहक और अभिभावक सेवा प्राप्त करने वाले नागरिक के बजाय उपभोक्ता बनकर रह जाते हैं।
डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार शिक्षा के व्यवसायीकरण का सबसे बड़ा प्रभाव आर्थिक असमानता के रूप में सामने आ रहा है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है, जिससे गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने तक को मजबूर हैं। इससे समान अवसर की अवधारणा कमजोर होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी संस्थान का प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना बन जाता है तो शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, शोध कार्य, पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक नवाचारों पर अपेक्षित निवेश नहीं हो पाता।
परिणामस्वरूप विद्यार्थियों को डिग्रियां तो मिल जाती हैं, लेकिन व्यवहारिक ज्ञान और कौशल का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता।
लेख में कोचिंग संस्कृति पर भी चिंता व्यक्त की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर अरबों रुपये का उद्योग खड़ा हो चुका है, जहां सफलता की कहानियों का व्यापक प्रचार होता है,
जबकि बड़ी संख्या में असफल विद्यार्थियों की चुनौतियां चर्चा से बाहर रह जाती हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य व्यापक बौद्धिक विकास के बजाय केवल परीक्षा तक सीमित होकर रह जाता है।
डिजिटल शिक्षा के बढ़ते विस्तार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल पाठ्यक्रम नई संभावनाएं लेकर आए हैं, लेकिन कई स्थानों पर इन्हें भी केवल व्यावसायिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है। आकर्षक प्रचार और बड़े-बड़े दावों के बीच शिक्षा के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ है।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी निजी शिक्षण संस्थान शिक्षा का अनुचित व्यापार नहीं कर रहे हैं। अनेक संस्थान गुणवत्तापूर्ण और समाजोपयोगी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। समस्या निजी क्षेत्र नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जिसमें शिक्षा को केवल लाभ कमाने का साधन समझा जाता है।
डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि सरकार, शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों सभी को मिलकर शिक्षा में पारदर्शिता, गुणवत्ता, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक मूल्यों को मजबूत करना होगा। शुल्क निर्धारण में संतुलन, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने अपने लेख के अंत में कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान, विवेक, नैतिकता और सामाजिक उत्थान है। यदि शिक्षा को केवल व्यापार का माध्यम बना दिया गया तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य पर पड़ेगा। इसलिए शिक्षा को पुनः उसके मूल स्वरूप से जोड़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।