Bihar News ये कैसा अमृत महोत्सव आज भी बरकरार है छुआ छूत की भावना

Bihar News What kind of Amrit Mahotsav is this Even today the feeling of touch and contagion remains intact.
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संवाददाता मोहन सिंह बेतिया

शहीदे आजम भगत सिंह ने फांसी के फंदे पर लटकने तक भी ऊंच-नीच एवं छुआछूत अपने जीवन काल में पनपने तक नहीं दिया। उन्होंने साफ सफाई करने वाले एक भंगी के रूप मैं अपनी मां का दर्शन पाया था। भगतसिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ? तब भगत सिंह कहते, मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।
यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।Bihar News What kind of Amrit Mahotsav is this
 Even today the feeling of touch and contagion remains intact.

भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ। पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।

सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!

बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आजम के लिए रोटिया बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई। भगत सिह के मुंह में रोटी का गास डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया। भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया।Bihar News What kind of Amrit Mahotsav is this
 Even today the feeling of touch and contagion remains intact.

ऐसी सोच के मालिक थे अपने वीर सरदार भगत सिंह जी…। परन्तु आजादी के 76 साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव की भावना को दूर करने के लिये वो न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया।
महान शहीदे आजम को इस देश का सलाम।

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