Banjar: Short Story
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बंजर: लघु कहानी

कथाकार -जया मोहन प्रयागराज
रघु एक किसान था रमिया के साथ उसका विवाह हुए दस बरस से ऊपर हो रहा था। पता नहीं प्रभु की क्या मर्जी थी कि उनके आंगन में अभी तक किलकारी नहीं गूंजी थी। रघु अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था। पत्नी थी भी सुंदर सुशील गुणों वाली दोनों औलाद ना होने का दर्द अपने मन में दबाए रखते पर एक दूसरे पर कभी जाहिर ना होने देते। लोग कहते रघु दूसरा ब्याह कर ले। तेरे तो और भाई बहन नहीं है तेरा वंश ही खत्म हो जाएगा। रघु एक कान से सुन दूसरे कान से बात निकाल देता। रमिया को जो भी लोग व्रत पूजा बताते वह पूरे मन से उसे करती। रघु भी ओझा वैद्य को दिखाता। परिणाम फिर भी शून्य रहता। रघु के पास एक बंजर जमीन का टुकड़ा था।

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एक दिन प्रधान जी ने कहा रघु इसे किशन को बेच दे वह इसमें घर बनवा लेगा। नहीं-नहीं प्रधान जी हमारे पुरखों की जमीन है हम नहीं बेचेंगे। ठहाका लगाते हुए प्रधान जी बोले क्या करेगा इस बंजर टुकड़े का। इसमें कुछ भी नहीं होना है। तू हर साल पागलों की तरह मेहनत करता है तो क्या भगवान ने सुना। सुनेगा प्रधान जी ।हो हो हंसकर प्रधान कहता बस काट दे बिन उपज बिन संतान जिंदगी तेरे पास बंजर बाँझ दोनों हैं। बात रघु के कलेजे को छेद गई। रात भर करवट बदलता रहा। रमिया पूछ -पूछ कर थक गई क्या चिंता है काहे बेचैन हो। कुछ नहीं सो जा तू ,प्रधान जी के व्यंग बाण रघु का दिल चाक कर रहे थे। सुबह उठा तो सिर भारी था रात में ठीक से ना सोने के कारण। मुझे परेशानी नहीं तो लोगों को क्यों है। अरे आज हाथ मुँह नहीं धोगे कलेवा कर लो दिन चढ़ गया। आ रहा हूँ दातुन कर रघु गया रमिया ने गुड़ की चाय के साथ बासी रोटी दी । आज गांव में कृषि विभाग के अधिकारी आए थे वह गांव वालों को जमीन की मिट्टी की पहचान बता रहे थे। रघु ने हाथ जोड़कर पूछा साहब हमारी बंजर जमीन में भी कुछ हो सकता है क्या। चलो पहले दिखाओ तो सही।मिट्टी देख कर उन्होंने कहा रघु इसमें सूरजमुखी उगाओ।थोड़ी मेहनत व खाद से अच्छी फसल होगी। साहब पर फूल उगा कर हम करेंगे क्या। अरे रघु इसे शहर ले जाकर बेचना इससे तेल बनता है मैं तुम्हें बता दूंगा कहां बेचना है। मन में आशा की किरण फूटी। रघु ने साहब के बताए अनुसार काम किया थोड़ी मेहनत व खाद सेखेत में पौधे निकले। रघु खुश होकर सोच रहा था चलो मेरी धरती का बंजर पन तो खत्म हुआ। काश मेरे भी संतान होती। पौधों में कली आने लगी। एक सुबह रमिया और रघु खेत जा रहे थे देखा झाड़ी में पॉलिथीन में पड़ी कोई चीज कुलबुला रही है। उत्सुकता बस पहुंचे तो आवाक रह गए। नवजात को कोई फेक गया था। अरे राम-राम कौन कसाई है। झट रमिया ने पॉलिथीन फाड़ बच्चे को उठाकर आंचल से ढक लिया। तभी गांव के लोग आ गए। यह बच्ची मिली है हम इसे पालेंगे ईश्वर ने हमें उपहार दिया है। सभी ने सहमति जताते हुए बधाई दी। पास ही रामू का खेत था सुबह सूरज निकलते ही सूरजमुखी के फूल खिल उठे किसी ने कहा रघु तेरी बंजर जमीन पर फूल खिल उठे।रघु ने हाथ ऊपर की ओर जोड़ते हुए कहा कितना दयालु है प्रभु एक साथ दोनों खुशियां मेरी झोली में डाल दी। आज मुझे तूने बंजर व बांझ दोनों के कलंक से मुक्त कर दिया बच्ची भूख से रोने लगी। अरे घर चलो यह भूखी है। हां हां रमिया। आज मेरे जीवन में भी खुशियों के सूरजमुखी खिल गए। मुस्कुराते हुए भविष्य के सपने बुनते दोनों बच्ची को ले घर की ओर चल पड़े।