नम्रता : चल पड़ी मैं दैनिक क्रिया से निर्वित्त होने

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नम्रता : वरिष्ठ रचनाकार जया मोहन प्रयागराज

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एक सीधी सादी अपने मे खोई हुई। खुद अपनी सुंदरता से अनजान अल्हड़ सहमी हिरनी सी मैं बात कर रही हूं अपने पड़ोस में आई एक लड़की की मेरे मन मे उसकी यही छवि थी। मैं कहती माँ बाप के रखे नाम जैसे गुण है।कितनी विन्रम मितभाषी।मुझसे ये कथन सुन कर ऊबे हुए मेरे पति कहते कितना जानती हो तुम उसे अरे दूर से चमकने वाली हर चीज सोना नही होती। मुझे लगा ये तो पुरषो की आदत होती है ।एक दिन हो हल्ला सुन नींद खुली क्या हुआ।देखता हूं ये बालकनी में चले गए।मुझे धीरज नही रह मैं गयी तो देखा नम्रता के घर पुलिस आयी थी। वो उसे बैठा कर जीप में अपने साथ ले गयी। मन मे बबंडर उठ रहा था पता नही क्यो बेचारी को ले गए।मेरे बार बार पूछने पर खिसियाते हुए बोले जाकर पूछना चाहिए था।निकालूँ कार ज्यादा बेताब हो जानने के लिए।न खुद सोएगी न दूसरों को सोने देगी।मैं चुपचाप लेट गयी पर नींद आँखो से कोसो दूर।
देर तक जागने के कारण नींद देर से खुली। ये अखबार पढ़ रहे थे।जाग गयी ।लो पढ़ो क्या है।तुम्हारी नम्रता की खबर ।मैंने झट लगभग खीचते हुए पेपर लिया। देखते की धम्म से सोफे पर बैठ गयी। जिसे में सादगी की मूर्ति समझ रही थी वो पति हंता थी।
पर पुरुष के प्यार के लिए वो कत्ल कर भाग कर आई थी।उसके प्रेमी ने ये घर दिलाया था।सिर भन्ना रहा था हे भगवान चेहरे पे चेहरा लगा रखा था उसने।जिसे मैं मितभाषी सीधी सरल समझ रही थी वो ऐसी निकली।इसी लिए वह किसी से नही बोलती डर के मारे सहमी रहती।में पता नही कब तक खोई रहती नम्रता के विचारों में तभी इनकी आवाज सुनाई दी कहां खो गई ।चलना है क्या बेचारी से मिलने मैंने बुरा से मुँह बना कर गर्दन झटक दी
चल पड़ी मैं दैनिक क्रिया से निर्वित्त होने।

स्वरचित
जयश्री श्रीवास्तव
जया मोहन
प्रयागराज
28,04,2020

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