Agra News :“दहेज प्रथा: पारिवारिक त्रासदी और सामाजिक कलंक”

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आगरा। भारतवर्ष विभिन्न सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं वाला विशाल देश है। समय के साथ भारतीय समाज ने अनेक बदलाव देखे हैं। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया, शिक्षा ने चेतना का विस्तार किया, लोकतांत्रिक मूल्यों ने समानता और स्वतंत्रता की अवधारणा को मजबूत किया और महिलाओं ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का प्रमाण दिया। इसके बावजूद कुछ सामाजिक कुरीतियां आज भी आधुनिकता के बीच मजबूती से मौजूद हैं। दहेज प्रथा ऐसी ही एक गंभीर सामाजिक बुराई है।

दहेज केवल विवाह के समय धन, वस्तु या संपत्ति के लेन-देन का विषय नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतिबिंब है जिसमें बेटी को एक स्वतंत्र मनुष्य के बजाय आर्थिक दायित्व के रूप में देखा जाता है। दहेज ने कई बार विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था को आर्थिक सौदे में बदल दिया है, जहां वर की शिक्षा, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति के आधार पर उसकी ‘कीमत’ तय की जाती है।
दहेज की समस्या समाज के लगभग सभी वर्गों और आर्थिक स्तरों में किसी न किसी रूप में दिखाई देती है। यह मान लेना कि दहेज केवल अशिक्षित या पिछड़े परिवारों की समस्या है, वास्तविकता से आंखें मूंदना है। उच्च शिक्षित और संपन्न परिवारों में भी कार, मकान, नकद राशि, आभूषण, महंगे उपकरण अथवा व्यवसाय में निवेश जैसी अपेक्षाएं देखने को मिलती हैं।

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कई बार दहेज को ‘उपहार’, ‘बेटी को दिया गया सामान’, ‘परंपरा’ या ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ जैसे शब्दों के पीछे छिपा दिया जाता है। लेकिन यदि किसी वस्तु या धन की मांग विवाह की शर्त बन जाए, तो नाम बदलने से उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता।

पितृसत्तात्मक सोच है दहेज की बड़ी वजह
दहेज प्रथा की जड़ें केवल विवाह व्यवस्था में नहीं, बल्कि उस पितृसत्तात्मक सोच में हैं जिसमें पुत्र को परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी और पुत्री को दूसरे घर की सदस्य माना जाता है।
बचपन से बेटी को ‘पराया धन’ कहने वाली मानसिकता उसके विवाह को परिवार पर आर्थिक बोझ के रूप में देखने लगती है। दूसरी ओर बेटे को परिवार का सहारा और वंश का वाहक मानने से उसके विवाह के समय आर्थिक लाभ लेने की प्रवृत्ति पैदा होती है।
इस सोच के कारण विवाह दो व्यक्तियों की समान साझेदारी के बजाय आर्थिक सौदे का रूप ले लेता है।
दिखावे की होड़ भी बढ़ा रही दहेज की मानसिकता
विवाह समारोहों में दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। कितनी गाड़ियां आईं, कितना सोना दिया गया, विवाह स्थल कितना भव्य था और वर को क्या-क्या दिया गया—इन सवालों को कई बार परिवार की ‘इज्जत’ से जोड़ दिया जाता है।
कई माता-पिता अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च केवल सामाजिक दबाव के कारण करते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें वर्षों तक कर्ज चुकाना पड़ता है। निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए यह आर्थिक बोझ बेहद गंभीर हो सकता है।
दहेज उत्पीड़न का सबसे क्रूर चेहरा
दहेज की मांग पूरी न होने पर विवाह के बाद महिला को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है। ताने, अपमान, मारपीट, मायके से पैसे लाने का दबाव, आर्थिक नियंत्रण और सामाजिक अलगाव जैसी परिस्थितियां महिला का जीवन कठिन बना देती हैं।

कई मामलों में दहेज संबंधी हिंसा गंभीर रूप ले लेती है और महिला की जान तक चली जाती है। ऐसी घटनाओं को केवल ‘पारिवारिक विवाद’ कहकर नजरअंदाज करना सामाजिक संवेदनहीनता है।

जहां किसी महिला को दहेज की मांग पूरी न होने पर प्रताड़ित किया जाता है, वहां समस्या केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह पूरे समाज की मानसिकता पर सवाल खड़ा करती है।
बेटी के जन्म से पहले शुरू हो जाती है चिंता
दहेज की समस्या का एक दुखद पक्ष यह भी है कि इसकी चिंता कई परिवारों में बेटी के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। बेटी के जन्म पर खुशी के बजाय उसके भविष्य के विवाह और दहेज की चिंता करने वाली सोच लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देती है।
जब बेटी को ‘जिम्मेदारी’ और बेटे को ‘निवेश’ समझा जाएगा, तब लैंगिक समानता की वास्तविक स्थापना संभव नहीं होगी। इसलिए दहेज विरोधी अभियान को केवल विवाह के समय होने वाले लेन-देन तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

दहेज से आर्थिक रूप से कमजोर होते परिवार
दहेज के कारण अनेक परिवार अपनी जीवनभर की बचत विवाह में खर्च कर देते हैं। कई बार जमीन बेचनी पड़ती है, संपत्ति गिरवी रखनी पड़ती है या कर्ज लेना पड़ता है।

जिस विवाह को दो परिवारों के बीच प्रेम, सहयोग और साझेदारी का रिश्ता बनना चाहिए, वही यदि एक परिवार पर आर्थिक बोझ डाल दे तो यह सामाजिक व्यवस्था की गंभीर विफलता है।
हालांकि इसके लिए केवल वर-पक्ष को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। दहेज देने और लेने दोनों को सामाजिक स्वीकृति देने वाली मानसिकता को बदलना जरूरी है।

शिक्षा के बावजूद क्यों नहीं खत्म हो रहा दहेज?
यह सवाल महत्वपूर्ण है कि शिक्षित समाज में भी दहेज प्रथा समाप्त क्यों नहीं हो रही।
इसका एक उत्तर शिक्षा की प्रकृति में छिपा है। केवल डिग्री प्राप्त कर लेना वास्तविक शिक्षा नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के विचारों, व्यवहार और मूल्यों में सकारात्मक परिवर्तन लाना भी है।
यदि कोई व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी विवाह में लाखों रुपये, कार या संपत्ति की मांग करता है, तो उसकी डिग्री उसके ज्ञान का प्रमाण हो सकती है, लेकिन उसके संस्कार और सामाजिक चेतना का नहीं।

कानून के साथ सामाजिक चेतना भी जरूरी
दहेज के खिलाफ कानूनी प्रावधान मौजूद हैं और दहेज संबंधी उत्पीड़न तथा घरेलू हिंसा के मामलों में कानूनी संरक्षण भी उपलब्ध है। लेकिन केवल कानून से सामाजिक मानसिकता को पूरी तरह बदलना संभव नहीं है।

कानून अपराध होने के बाद कार्रवाई कर सकता है, लेकिन हर परिवार की सोच को बदलने का काम समाज और परिवारों को स्वयं करना होगा। इसके लिए सामाजिक चेतना, नैतिक शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और सामुदायिक सहभागिता आवश्यक है।

युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
दहेज विरोधी अभियान में युवाओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। विवाह योग्य युवा यदि यह संकल्प लें कि वे दहेज नहीं लेंगे और अपने परिवार को भी दहेज लेने की अनुमति नहीं देंगे, तो दहेज व्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।
किसी युवक की वास्तविक योग्यता उसकी नौकरी, वेतन या पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और जीवनसाथी के प्रति सम्मान से तय होनी चाहिए।

इसी तरह युवतियों को भी यह आत्मविश्वास विकसित करना होगा कि वे दहेज मांगने वाले परिवार से विवाह करने से इंकार कर सकें। विवाह जीवन की साझेदारी है, आत्मसम्मान का समझौता नहीं।

बेटी को दहेज नहीं, आत्मनिर्भरता चाहिए
माता-पिता को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। बेटी की शादी में अत्यधिक धन खर्च करने के बजाय उसकी शिक्षा, कौशल, आत्मनिर्भरता और निर्णय क्षमता में निवेश करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

बेटी को महंगे सामान देने के बजाय उसे आर्थिक रूप से सक्षम बनाना उसके भविष्य की वास्तविक सुरक्षा है। शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला शोषण के विरुद्ध अधिक मजबूती से खड़ी हो सकती है।

बेटी को दहेज नहीं, समान अवसर चाहिए
मीडिया और सोशल मीडिया की भी जिम्मेदारी
मीडिया, फिल्म, धारावाहिक, विज्ञापन और सोशल मीडिया विवाह को अत्यधिक खर्च और दिखावे से जोड़ने वाली संस्कृति को प्रभावित करते हैं। महंगी शादी को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने वाली प्रवृत्ति दहेज की मानसिकता को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत कर सकती है।
मीडिया को विवाह की वास्तविक सुंदरता—समानता, प्रेम, सम्मान, साझेदारी और जिम्मेदारी—को अधिक प्रमुखता देनी चाहिए।
सोशल मीडिया पर भी दिखावे की शादी की प्रतिस्पर्धा के बजाय सादगीपूर्ण और समानता आधारित विवाह को सम्मान मिलना चाहिए।
सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं निभाएं जिम्मेदारी
धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, पंचायतों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक समूहों को सामूहिक रूप से दहेज विरोधी अभियान चलाने की आवश्यकता है।

दहेज रहित विवाह करने वाले परिवारों को सम्मानित किया जा सकता है। सामूहिक विवाह और सादगीपूर्ण विवाह को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। दहेज मांगने की प्रवृत्ति को सामाजिक स्वीकृति से वंचित करना भी प्रभावी कदम हो सकता है, बशर्ते किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों का उल्लंघन न हो।

स्कूल-कॉलेजों में हो दहेज विरोधी जागरूकता
शैक्षणिक संस्थानों में दहेज विरोधी चेतना को केवल किसी एक दिवस के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
विद्यार्थियों के बीच वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, नाटक, पोस्टर अभियान, कानूनी जागरूकता कार्यक्रम और लैंगिक समानता पर कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए।

युवाओं को यह समझना होगा कि सामाजिक परिवर्तन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपने व्यक्तिगत निर्णयों के माध्यम से समाज में बदलाव ला सकता है।
महिला आर्थिक सशक्तीकरण भी जरूरी

दहेज प्रथा के खिलाफ संघर्ष को महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जोड़ना आवश्यक है। रोजगार, कौशल विकास, संपत्ति एवं उत्तराधिकार के अधिकार, वित्तीय साक्षरता और उद्यमिता के अवसर महिलाओं को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं।
आर्थिक आत्मनिर्भरता दहेज प्रथा का अकेला समाधान नहीं है, लेकिन यह महिला को शोषणकारी परिस्थितियों के खिलाफ अधिक मजबूत आधार प्रदान करती है।

सादगीपूर्ण विवाह को मिले सम्मान
विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता बनने से रोकना होगा। लाखों रुपये केवल सामाजिक दिखावे के लिए खर्च करने की होड़ आने वाली पीढ़ियों को भी इसी चक्र में फंसा सकती है।
सादगीपूर्ण विवाह को पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और आर्थिक विवेक का प्रतीक माना जाना चाहिए।
स्त्री सम्मान केवल नारों से नहीं, व्यवहार से होगा

समाज एक ओर स्त्री को देवी के रूप में पूजता है और दूसरी ओर विवाह के समय उसकी कीमत तय करने लगता है। एक ओर महिला सशक्तीकरण और समानता की बात होती है, दूसरी ओर विवाह के नाम पर आर्थिक सौदेबाजी की जाती है।
इस विरोधाभास को समाप्त किए बिना महिला सम्मान की कोई भी बात अधूरी है।

स्त्री सम्मान पूजा, भाषण या प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उसके अधिकारों, स्वतंत्रता और निर्णयों के वास्तविक सम्मान से सुनिश्चित होगा।
अब मानसिक क्रांति की जरूरत
दहेज प्रथा का अंत केवल कानून से नहीं होगा। इसके लिए मानसिकता में परिवर्तन जरूरी है।
हर परिवार को स्वयं से पूछना होगा कि क्या वह बेटी की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को विवाह में दिए जाने वाले सामान से अधिक महत्वपूर्ण मानता है।

हर युवक को सोचना होगा कि क्या उसकी योग्यता इतनी कम है कि उसे विवाह के बदले धन और वस्तुओं की आवश्यकता है।
हर माता-पिता को यह विचार करना होगा कि क्या वे बेटी को आर्थिक बोझ समझकर उसका भविष्य तय कर रहे हैं।
और हर नागरिक को तय करना होगा कि वह दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा मानेगा या इसके खिलाफ खड़ा होगा।

निष्कर्ष: दहेज के खिलाफ सामूहिक संकल्प जरूरी
डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, दहेज केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक चरित्र की परीक्षा है। यह समस्या किसी एक परिवार, जाति, वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता से जुड़ी हुई है।

दहेज के कारण यदि किसी बेटी की आंखों में भय, किसी पिता के कंधे पर कर्ज, किसी मां के हृदय में चिंता और किसी नवविवाहिता के जीवन में हिंसा दिखाई देती है, तो यह केवल एक परिवार की विफलता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना की विफलता है।
हमें यह संकल्प लेना होगा कि बेटी विवाह में कोई आर्थिक सौदा नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाली मनुष्य है। वर कोई बिकाऊ वस्तु नहीं, बल्कि जिम्मेदार जीवनसाथी है। विवाह कोई बाजार नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों की समान साझेदारी है।

जिस दिन यह विचार भारतीय समाज की सामान्य चेतना का हिस्सा बन जाएगा, उस दिन दहेज प्रथा का अंत केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की वास्तविकता में भी दिखाई देगा।

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