आगरा।
माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि वह जीवन के हर मोड़ पर संबल, संस्कार और संवेदनाओं का आधार बनती है। इसी भाव को बेहद मार्मिक और साहित्यिक शैली में व्यक्त किया है डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के डिप्टी नोडल अधिकारी MyGov डॉ प्रमोद कुमार ने अपनी नई रचना “माँ की विरासत” में।
यह कविता केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों, मातृभूमि और मातृभाषा के महत्व को दर्शाने वाला एक सामाजिक संदेश भी है। कविता में माँ के विभिन्न रूपों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है।

डॉ प्रमोद कुमार ने अपनी रचना में बताया कि जन्म देने वाली माँ अपने त्याग, प्रेम और संघर्ष से संतान के जीवन को आकार देती है। वह स्वयं कठिनाइयाँ सहकर भी बच्चों के सपनों को पूरा करने का प्रयास करती है। कविता में माँ की ममता, लोरियों, अधूरी नींद और निस्वार्थ प्रेम का अत्यंत भावुक चित्रण किया गया है।
इसके साथ ही उन्होंने रिश्तों में मिलने वाली दूसरी माँ यानी सास के स्वरूप को भी सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। कविता में दर्शाया गया कि प्रेम और सम्मान मिलने पर यह रिश्ता भी अपनापन और विश्वास का मजबूत आधार बन सकता है।
रचना का एक महत्वपूर्ण भाग मातृभूमि को समर्पित है, जिसमें देशभक्ति और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है। डॉ प्रमोद कुमार ने लिखा कि मातृभूमि केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि इतिहास, संघर्ष, बलिदान और अस्मिता की पहचान है। सैनिकों के बलिदान और देश की मिट्टी से जुड़े भावों को भी कविता में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
कविता में मातृभाषा के महत्व को भी विशेष स्थान दिया गया है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी आत्मा, संस्कृति और पहचान का संगीत है। मातृभाषा से दूर होना अपनी जड़ों से दूर होने जैसा है।
साहित्य प्रेमियों और शिक्षाविदों के अनुसार “माँ की विरासत” वर्तमान समय में पारिवारिक मूल्यों, भारतीय संस्कृति और भाषा संरक्षण का संदेश देने वाली प्रेरणादायक रचना है। सोशल मीडिया पर भी इस कविता को पाठकों द्वारा काफी सराहा जा रहा है।
डॉ प्रमोद कुमार की यह रचना समाज को यह संदेश देती है कि माँ के हर स्वरूप—जन्मदात्री, रिश्तों की माँ, मातृभूमि और मातृभाषा—का सम्मान करना ही हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।