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प्राकृतिक आपदा से राज्य सरकारें सबक नहीं लेतीं

जनवाद टाइम्स 8 February 2021
State governments do not learn from natural disaster
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सुनील पांडेय- कार्यकारी संपादक

भारत की पवित्रम स्थलों में एक उत्तराखंड राज्य में 8 फरवरी रविवार को आई प्राकृतिक जल आपदा से वहां का जनजीवन पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया । उत्तरा -खंड राज्य में इस तरह का कहर सात वर्ष पूर्व वर्ष 2013 में 16 जून को रात चौराबाड़ी ग्लेशियर में बनी झील फटने से केदारनाथ में हुआ था। उस समय उत्तराखंड में ऐसे ही बादल फटने से एक जल सैलाब आया था जिसमें लगभग छः हजार लोगों को जान गवानी पड़ी थी । इतना ही नहीं उस समय इस आपदा के चलते इस राज्य को अपार धन संपदा का भी नुकसान भी हुआ था। प्रकृति द्वारा दिए गए उस जख्म का घाव अभी पूरी तरह से भरा भी नहीं था तभी कल यानी रविवार को एक और आपदा ने उत्तराखंड राज्य को निर्मम चोट दी। प्रकृति से आच्छादित इस राज्य को कल ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही का सामना करना पड़ा। अब तक मिली जानकारी के अनुसार इस प्राकृतिक आपदा में 200 से अधिक लोगों फंसे है। इसमें 170 लोग लापता हैं और 13 लोंगों के शव भी प्राप्त हुए हैं। आपदा के समय वहां पर उपस्थित लोगों का अभिमत है कि लापता लोगों की संख्या अनुमान से अधिक हो सकती है। उत्तराखंड सरकार राहत एवं बचाव कार्य में बिना विलंब किए हुए सरकारी मशीनरी एवं सेना के सहयोग से पुरी सतर्कता और मुस्तैदी पूर्ण जुट गई है। तबाही के असल कारणों का अभी तक पता नहीं चल सका है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने के बाद ही सही जानकारी मिल पाएगी। अब तक प्राप्त सूचना के अनुसार यही कहा जा रहा है कि वहां झील बनने से यह भयंकर तबाही आई ।

State governments do not learn from natural disaster
कल उत्तराखंड में आई इस भयंकर त्रासदी में सुबह 10:00 बजे नंदा देवी बायोस्फीयर क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने से 13.2 मेगावाट की हाइड्रो परियोजना पूरी तरह तबाह हो गई इसमें 35 लोग बह गए ।इनके जीवित होने की कम ही संभावना है। वही 10:25 पर चमोली जनपद में ऋषि गंगा परियोजना से करीब 10 किलोमीटर दूर धौलीगंगा पर 520 मेगावाट का तपोवन विष्णुगाड पावर प्रोजेक्ट का बैराज नदी के उफान से क्षतिग्रस्त हो गया। इसके चलते 125 लोगों इस जल सैलाब में बह गए। 11:30 पर जोशीमठ से होते हुए अलकनंदा नदी का उफान मलबे के साथ पीपलकोटी पहुंचा। प्रशासन ने एहतियात बरतते हुए पहले ही आसपास के सभी गांव खाली करा लिए थे और याता –यात व्यवस्था को पूरी तरह रोक दिया गया । 12:20 पर पीपल कोटी से जल प्रवाह के साथ नंद प्रयाग के पास पहुंचा। अलकनंदा नदी के उफान से कर्णप्रयाग से जल स्तर में भी वृद्धि हुई है लेकिन अभी तक कोई नुकसान होने की सूचना नहीं मिली। दोपहर 2:00 बजे के बाद अलकनंदा नदी का पानी कुछ स्थिर हुआ और श्रीनगर पहुंचा । ऐतिहात बरतते हुए यहां स्थित बांध से कुछ पानी पहले भी छोड़ा जा चुका था। फिर बाढ़ के पानी को अवरुद्ध कर नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। 2:25 पर श्रीनगर में अलकनंदा के जलस्तर में में वृद्धि हुई ,लेकिन राहत की बात यह रही यहां तक नदी का उफान काफी कम हो गया था । उत्तराखंड जनपद देवप्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में स्थित सामान्य रही लेकिन पुलिस प्रशासन पूरी तरह दिन भर अलर्ट नजर आया । उत्तराखंड राज्य में आई इस भयंकर जल त्रासदी से सीमावर्ती इलाकों को जोड़ने वाला पुल भी बह गया। इसमें लगभग छः गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट गया । इसके चलते धौलीगंगा, ऋषिगंगा एवं अलक नंदा में मलबे के साथ आए उफान के चलते चमोली से लेकर बिजनौर तक पूरे दिन उहापोह की स्थिति बनी रही। प्रशासन ने इस प्राकृतिक आपदा को देखते हुए गंगा वा सहायक नदियों के तट पर बसी बस्तियों को खाली कराने का अलर्ट जारी कर दिया था । इस प्राकृतिक आपदा से जानमाल के नुकसान को कम करने को ध्यान में रखकर टिहरी बांध के पानी को रोक दिया गया था , साथ ही बदरीनाथ हाईवे समेत कई सड़क मार्गों पर आवाजाही को पूरी तरह रोक दिया गया। कल दोपहर बाद स्थिति सामान्य होने पर यातायात को पुनः चालू किया गया। इसके साथ-साथ सरकारी मशीनरी अलर्ट मोड पर है और राहत एवं बचाव कार्य अभी भी जारी है। इस भयंकर जल त्रासदी की चलते एक बार पुनः प्राकृतिक संसाधनों एवं गंगा एवं उसकी सहायक नदियों के अति दोहन को लेकर पुनः आवाज उठने लगी है । यदि वैज्ञानिकों के नजरियों से देखें तो पूरा उत्तराखंड बेहद संवेदनशील है। भूकंप की दृष्टि से अवलोकन करें तो उत्तराखंड जोन पांच और चार में शामिल है जो अतिवृष्टि ,भूस्खलन, ग्लेशियर का टूटना जैसे अन्य कारणों से इस राज्य को अक्सर इस तरह की प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं यहां के पहाड़ अभी भी बनने की प्रक्रिया में जिससे आगे भी इस तरह की आपदा आने का अंदेशा बना हुआ है। कल हुई इस भयंकर जल त्रासदी को देखते हुए उत्तराखंड की सरकार यदि अब भी नहीं चेतीं तो भविष्य में इस तरह की अप्रिय घटना की दुबारा पुनरावृत्ति हो सकती है। यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि उत्तराखंड सरकार ने इस भयंकर त्रासदी से कितना सबक लिया।

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