Scattered Armaan (Story)
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बिखरे अरमान (कहानी)

कथाकार -जया मोहन

कलुआ खाना खा रहा था बुधिया पंखा झल रही थी। कलुआ बोला काहे बुधिया मोहे कितने दिन हो गए रोटी खाए जो दलिया सत्तू खिचड़ी खात खात मन उकता गाओ। का करो जाए । सब मालिक की मर्जी। अरे कछु मालिक की मर्ज़ी कछु गरीबी। काय इमे गरीबी कहां से आगई।
तै न समझे डुकरिया (बुुढ़ि़या) अरे हमाय पास पैसे होते तो दाँत लगवा लेते। तैने देखो नाही वो ग़ज़्ज़ु ठेकेदार नकली दातन से कैसे के मज़े से चने मूगफली कुटकुटाट है। जो तो भली कही तूमने।
मोसे तानकौ न खावात है बस पेट भर लेत है।

जानत हो मोय तो संपनन में भी गोल गोल फूली फूली रोटी ललचाती है।अहहा कैसी सौंधी सौंधी खुशबू होत है। याद है तोखा जब तै चूल्हे पर गरम गरम खरी खरी सेक सेक देत रही तब मैं दुइ चार ज्यादा खात जात रहो। सब याद मोय कछु न भुलानो। चल न डंगदर साहब के पास उनखा दिखा के दाँत लगवाए लो।सिर्री नही ता।तै पागल हो गयी का बिना पैसन के कोने देखत है का।उनके फीस दो सौ रुपैया है। चल तै खा ले। मैं परत( लेटता) हूँ करहाई(कमर) पिराय रही मोई। बुधिया भी खा कर लेट गयी।नींद आँखो से कोसो दूर थी। का करो राम कौन सा जतन करो इनका दाँत लगाने की सोचते सोचते सो गई।

Scattered Armaan (Story)
भिनसारे उठी जल्दी जल्दी सबरे काम निपटाओ। तबही ठाकुर साहब का मौडा( बेटा) आ गाओ राम राम।कक्की अम्मा ने बुलाओ है तुम्हे।जुग जुग जियो भैया। तुम चलो मैं आवत हो। बुधिया ठकुराइन के घर गयी।पाँव लागो मालकिन। काय बुधिया किते रही बहुत दिनन बाद दिखाई वो भी तब जब मैंने कह पठायो।का करो मालकिन उते खेतन पे मजूरी करन चली जात रहो। बुधिया अरहर धरी है डाल दर देत।होओ मैं दर दैहो।

बुधिया अब पैसे जोड़ने लगी बस एक ही धुन कल्लू के दाँत लगवाने की खातिर। एक दिन बोली सुनत हो।हैओ होओ बोल का कहत है।कल चलो डांगदर साहब के पास।तै पगला गयी का नही मोय कछु न भाओ।तुमाय दाँत लगवाने के लाने ।कल्लू हँसा पैसा न कौड़ी बीच बाजार अम्मा दौड़ी। अरे चलो तो सही। मोय पास पैसा है।उसकी ज़िद मान कल्लू डांगदर के यहाँ गया ।बुधिया ने हाथ जोड़ कहा मोरे पास इत्ते रुपये है ।बड़ी किरपा होगी इनके दाँत लगा दो।डॉक्टर साहब रहमदिल भले थे।उनकी गरीबी देख बोले ।बस तुम आठ सौ दे देंना। दवा व फीस मत देना ।आप तो हमाय लाने भगवान हो।खुशी के मारे कल्लू बोला काय साहब का फिर मैं रोटी खा पाहो ।डॉक्टर साहब हँस कर बोले हाँ दद्दू सब कुछ खा सकोगे।मैंने नाप ले लिया है तुम पन्द्रह दिन बाद आना।पाँव पड़ो।अरे अरे ये क्या कर रहे आप बड़े है जाइये खुशी खुशी दोनों लौट आये।बुधिया बार बार पैसा गिन रही थी।अब इमे तीन सौ कम है।का करो किते से लाई। कल्लू ने आवाज दी का कर रही।कछु नही पैसा गईं रही।कितेक भये।अबे तीन सौ कम परत है ।पंद्रह दिन में कैसे हुईहै।तुम चिंता न करो।राम जी पूर करीहे।सुबह बुधिया ठकुराइन के यहाँ गयी।का भाओ बुधिया सुबरे सुबरे।

मालकिन मोय तीन सौ रुपये उधार दे दो मै काम करके चुका देहो।अरे का काम पड़ गाओ इत्ते रुपयन को। मैं दे दैहो। बुधिया ने भगवान को मन ही मन धन्यवाद दिया। सारी रात पति पत्नी को नींद नही आई।सो गई का बुधिया नही का भाओ।जब मोरे दाँत लग जाहे तो मोरी सुरतौ बदल जाहे।हाओ हाओ। तब तै जुन्दी की रोटी भाटे का भरता बनाये।अबे तो सो जाओ। सुबह जल्दी उठ बुधिया ने भरता रोटी बनाई पता नही कित्ती देर लगे।दोनों खुशी खुशी गए बत्तीसी लग गयी।कल्लू बार बार शीशा देख मुस्कुरा रहा था।देख बुधिया कैसो बदल गाओ मैं।हाओ हाओ।दोनों चल पड़े।मोय बड़ी कस के भूख लगी है भूख के मारे मोरी जान निकरी जा रही है।हाओ घरे तो पहुँचो तबही तो खाओ।मोसे भूख बर्दाश्त नही हो रही।कछु पैसा है का।बीस रुपये बचे है। जा जा उते रोटी बिक रही ले आ।मैं खा ले तो जी जुड़ाई।तुमहू का बच्चन सी बात करत हो घर चलो उतई का लियो।खीझ गया कल्लू जब मर जैहौ तब ख़िलाईयो। बुधिया चुपचाप सड़क पार कर रोटी सब्ज़ी ले कर लौट रही थी।तभी पीछे से एक सांड दौड़ता आ रहा था कल्लू चिल्लाया बच बुधिया तोय पीछे सांड है ।शोर के कारण बुधिया सुन न सकी कल्लू बचाने दौड़ा सांड के धक्के से गिर गया बत्तीसी छिटककर दूर गिरी एक ट्रक रौदता निकल गया।सड़क पर रोटी सब्ज़ी पड़ी थी लोगो ने उन्हें उठाया।दोनों अपने बिखरे अरमानों को देख रो रहे थे।एक पल में सारे सपने चकनाचूर हो गए थे।