उतरप्रदेश सम्पादकीय

नए कृषि कानून को लेकर सरकार बनाम किसान आंदोलन

कार्यकारी संपादक सुनील पांडेय

हमारे देश में कृषि सुधार की मांग वर्षों से की जा रही थी। वर्तमान में सत्तासीन मोदी सरकार ने किसानों की आय दुगनी करने एवं कृषि में सुधार के लिए संसद में 3 विधेयकों को सितंबर माह के अंतिम सप्ताह में पारित किया था। ये तीन विधेयक जिन पर सरकार और किसान के बीच गलतफहमी है उनका यहां जिक्र करना लाजमी होगा । इनमें पहला “कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य अध्यादेश” दूसरा “आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन” एवं तीसरा एवं अंतिम “मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश” है। जब सरकार ने इन्हें पारित किया था तो सरकार की ओर से किसानों को विश्वास दिलाया गया था इस विधेयक के कानून बनने से किसान का कोई अहित नहीं होगा ,वरन् किसान का इससे फायदा ही होगा। सरकार ने इसकी विशेषता बताते हुए कहा था कि ये पूरी तरह से किसानों के हक में हैं और वे अपने उत्पाद अपनी मर्जी से कहीं भी बेच सकेंगे , लेकिन पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे कांग्रेस शासित राज्यों ने इनका ना केवल विरोध किया अपितु अपने विशेष विधेयक भी विधानसभा से पारित करवा लिए । इन राज्यों द्वारा इतना सब करने के बावजूद इन विधेयकों को कानून बनना संदिग्ध है क्योंकि इनको भारत के राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना मुश्किल ही नहीं दुष्कर भी है ।

Government vs farmers movement regarding new agricultural law
कृषि विधेयक कानून का रूप लेने के पश्चात प्रायः पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान इसके विरोध में आ गए और इस विधेयक को रद्द करने की सरकार से अपील करने लगे। सरकार जब उनकी मांँगों को नहीं माना तो किसान आंदोलन पर उतर आए। सितंबर माह के बाद पिछले 2 माह से किसान कृषि संबंधी नए कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं । उनके आंदोलन के कारण रेल सेवाओं एवं सड़क यातायात को बाधित होना पड़ा। यदि इस कानून के संदर्भ में किसानों की दृष्टिकोण से बात करें तो किसानों को भय है कि नए कानून से कृषि उत्पादों की बिक्री स्टाक सीमा और कीमत सरकारी नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे ।उनकी सबसे बड़ी चिंता एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर है। किसानों को आशंका है कि इन नए कानूनों के कारण एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म हो जाएगी और वह व्यापारियों की दया पर निर्भर हो जाएंगे। जबकि इस विधेयक के समर्थन में सरकार लगातार दावा कर रही है कि एमएसपी खत्म नहीं होगा। इस मुद्दे को लेकर सरकार और किसान संगठनों में लगातार दस दिनों से गतिरोध जारी है। अब तक सरकार एवं किसान संगठनों एवं उनके प्रतिनिधियों के मध्य पांच दौर की वार्ता के बाद कोई ठोस हल नहीं निकल सका है। किसान अपने सभी मांगों को लेकर अड़े हुए हैं और वह इन 3 कृष कानूनों को खत्म करने से कम कोई मांग मानने को तैयार नहीं है। किसान संगठन अपने आंदोलन के समर्थन में आने वाले 8 दिसंबर को भारत बंद करने का आह्वान भी किया है। आंदोलन के दसवें दिन सरकार ने बातचीत के दौरान 5 संशोधनों का प्रस्ताव दिया लेकिन किसान 23 बदलाव चाहते हैं। किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा दिलाने की मांग पर अड़े रहे। अतः किसान संगठन और सरकार के मध्य पांचवे दौर की वार्ता भी बेनतीजा ही खत्म हुई। अब तक इन दस दिनों के दौरान इस समस्या का कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल सका। किसान प्रतिनिधि और सरकार के बीच छठे दौर की वार्ता 9 दिसंबर को होगी। किसानों की मांगों पर सरकार 9 दिसंबर को एक नया प्रस्ताव पेश करेगी ऐसा कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने कहा है। हमें उम्मीद करनी चाहिए शायद उस दिन इस समस्या का कोई सकारात्मक हल निकल आए।

Government vs farmers movement regarding new agricultural law
भारत में जारी किसान आंदोलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया आने लगी है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो और 32 ब्रिटिश सांसद किसान आंदोलन का समर्थन कर चुके हैं। भारत सरकार ने विदेशी नेताओं की टिप्पणियों को भ्रामक और गैरजरूरी बताते हुए जस्टिन त्रूदो के बयान को खारिज कर दिया और इसे भारत का आंतरिक मामला बताया। इतना ही नहीं अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी किसान आंदोलन का समर्थन किया है। गुटरेस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने कहा कि लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का हक है और अधिकारियों को उन्हें यह करने देना चाहिए। धीरे धीरे भारत का किसान आंदोलन अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है यदि शीघ्र ही इसका हल न निकाला गया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देश भी आने वाले दिनों में अपनी प्रतिक्रिया देंगे। हम भारत सरकार से एवं किसान संगठनों से विनम्र अपील करते हैं इस मुद्दे का कोई सर्वमान्य हल जल्दी नीकाले। जिससे इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीति न हो सके। भारत के कई राष्ट्रीय छोटे ,बड़े एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दल किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं । अपने शासनकाल में कांग्रेस कृषि कानून से संबंधित विधेयक लाना चाहती थी लेकिन किसी कारण बस नहीं ला सकी ।अतः उस समय इस कृषि कानून का समर्थक रही कांग्रेस आज अपने निजी स्वार्थों के कारण विरोध में में आ गई है। भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक दल का इस तरह पाल्हा बदलना भारतीय राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं है। इससे राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में भिन्नता की कहावत चरितार्थ होती है। मेरी राय में प्रतिपक्ष का कार्य केवल प्रत्येक कानून विरोध करना ही नहीं होता वरन् सकारात्मक कानूनों के समर्थन भी करना चाहिए। ऐसा करने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की साख बढ़ेगी ऐसा मेरा मानना है।