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सात बेटियों का बाप (कहानी) – सुनील पाण्डेय ‘सुकुमार’

जनवाद टाइम्स 14 January 2021
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सात बेटियों का बाप (कहानी)

सुनील पाण्डेय ‘सुकुमार’

आइए आपको एक ऐसे व्यक्ति कहानी सुनाते हैं जो शादीशुदा ना होते हुए भी एक नहीं सात-सात बेटियों का बाप है। ऐसा बाप जिसकी सभी बेटियां उस पर जान छिड़कती हैं। उसके खाने-पीने, दवा- दारू आदि का इतना ख्याल रखती हैं कि यदि उसको जरा सी भी तकलीफ हो जाए तो सभी सिहर उठती हैं।

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अब आप को उस महाशय का नाम जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो रही होगी। चलो अब मैं बहुत पहलेलियां नहीं बुझाता सीधे-सीधे उस महाशय का नाम बताता हूँ। नाम है सुरेंद्र उर्फ़ पंडित जी सुरेंद्र तो कम ही लोग जानते हैं मोहल्ले में वह पंडित जी के नाम से ही मशहूर हैं। पंडित जी बचपन से ही बड़े मनमौजी और अक्खड़ स्वभाव के थे ।जो मिल गया उसी में संतोष करना , दूसरे की चीज़ पर लालच ना करना ।अपने राम ने जो दिया उसी में खुश रहना उनकी आदत थी। ईमानदारी तो जैसी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी । अपने जीवन में किसी का एक भी पैसा बेईमानी नहीं किया। इस बात का गवाह वह खुद नहीं बल्कि उनका पूरा मोहल्ला था। किसी से भी पूछ लो पंडित जी के बारे में सभी यह कहते हैं पंडित जी जैसा स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति मैंने जीवन में नहीं देखा। उन्हें तो जैसे इन ससांसारिक चीजों से कोई लेना-देना ही नहीं था। रास्ते में आते जाते जब कोइ उन्हें मिल गया ,उनसे नमस्ते या प्रणाम कर लिया तो आशीर्वाद दे दिया, नहीं किया तो कोई बात नहीं। किसी से ना कोई गिला ना शिकवा बस अपनी धुन में मस्त रहना ही उनका स्वभाव था ।
पंडित जी एक उच्च कुल के ब्राह्मण थे और साथ ही साथ अपने अक्खड़पन के लिए मशहूर भी थे। उनकी डांट- फटकार में भी एक अपनत्व छुपा हुआ था। कोई भी व्यक्ति उनकी बातों का बुरा नहीं मानता था।। पंडित जी एकदम मुहफट प्रकृति के व्यक्ति थे। जो उन्हें अच्छा लगा उसे भी और जो बुरा लगा उसे भी बिना लाग लपेट के सामने वाले के मुंह पर कह देना उनका शगल था। सामने वाला व्यक्ति चाहे पैसे वाला हो, प्रतिष्ठित हो या सामान्य कोटि का व्यक्ति हो इससे उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। वह अक्सर बातों -बातों में कहा करते थे मेरा राम मुझे खिलाता है, अगर कोई सोचे वह मुझे खिला -पिला रहा है तो ये उसकी भूल है। मेरा राम सुबह से शाम तक में मेरे खाने-पीने की व्यवस्था जरुर करेगा । जब से मैंने होश संभाला है तब से लेकर आज 70 बरस की उम्र तक वो मेरा ध्यान रखता आया है और मुझे उम्मीद है आगे भविष्य में भी रखेगा ।मुझे उस पर तनिक भी संदेह नहीं है क्योंकि वो मेरा माई बाप भी है और मेरा यार भी है ।मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं है ।मैंने आज तक किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया और ना आगे भी फैलाऊँगा ।पंडित जी की वाणी ऊपर से तोे कठोर थी पर अंदर से सोचे तो वह सोलह आने सच थी। वह सच ही कहा करते थे यदि ऊपर वाले पर भरोसा हो तो वह सब की मदद करता है ।बस उस पर भरोसा करने की बात है । पंडित जी को अपने राम पर बहुत भरोसा था। पंडित जी बाहर से अक्खड़ स्वभाव के होने के बावजूद भी अंदर से संत स्वभाव के थे।तभी तो कोई उनकी बातों का बुरा नहीं मानता था। सभी हंसकर टाल देते और कहते पंडित जी जो कह रहे हैं वही सही है ।मेरी भी पंडित जी से थोड़ी बहुत जान- पहचान थी ।बातों बातों में मैंने एक दिन पंडित जी से हिम्मत करके पूछ ही लिया कि आप इस मोहल्ले में कब से रह रहे हैं? फिर उन्होंने अपनी राम कहानी सुनाते हुए मुझे बताया कि यहां से 15- 20 किलोमीटर दूर मेरा गांव है जहां पर मेरे पास थोड़ी बहुत खेती -बारी है।एक बार मेरे गांव में बहुत बरसात हुई तब मैं लगभग 16 -17 बरस का रहा हूंगा, मेरी सारी फसल उस बरसात में बर्बाद हो गई । मेरे मां- बाप पहले ही स्वर्गवासी हो चुके थे ,उनके ना रहने के बाद किसी तरह गांव में थोड़ी बहुत मेहनत मजदूरी और खेती -किसानी करके मेरी गुजर -बसर हो जाया करती थी। उस साल की बरसात के चलते मेरे खेत में अनाज एकदम नहीं हुआ ।मै रोजी-रोटी की तलाश में यहां शहर चला आया और इसी मोहल्ले में एक बालिका विद्यालय में रात में रखवाली करने का काम करने लगा। तब से लेकर आज तक मैें इसी विद्यालय में रह रहा हूँ और यहां की सभी शिक्षक- शिक्षिकाएं मेरा बड़ा ध्यान रखती हैं। इनमें छ: शिक्षिकाएं मेरा कुछ ज्यादा ही ध्यान रखती हैं जो मुझे अपने पिता जैसा स्नेह देती हैं । यह शिक्षिकाएं मेरे खाने-पीने से लेकर ओढने -बिछाने और दवा दारू आदि सभी जरूरत की वस्तुओं का प्रबंध भी करती हैं ।मैं तो कहता हूं मेरी यह छ: बेटियां जो जरूर पिछले जनम मेरी सगी बेटी रही होंगी। इतना तो मेरी सगी बेटियां होती तो शायद वो भी मेरा कितना ध्यान नहीं रखती ,जितना यह सब रखती हैं।

ईश्वर का संयोग है कि छः साल पहले मुझे मेरी एक सातवीं बेटी भी मिल गई ।यह भी मेरी छः बेटियों जैसे ही मेरा ध्यान रखती है ,पर उन बेटियों से थोड़ी अलग है। मेरी छः बेटियां मुझसे बहुत डरती हैं। मैं तो यह कहता हूँ वह डरती नहीं बल्कि मेरा सम्मान करती हैं । यदि मैंने गुस्से में इन्हें कभी कुछ बुरा- भला भी कह दिया तो भी यह बुरा नहीं मानती हैं। मेरी सातवीं बेटी थोड़ा अलग स्वभाव की है ।वह तो मुझे डांट- फटकार भी देती है और मैं चुपचाप सुन भी लेता हूँ।इतना ही नहीं कभी-कभी वह मुझसे लड़ती -झगड़ती भी है ,लेकिन यह लड़ाई सच्ची कि थोड़े ही है यह तो उसका प्यार है ।वो अक्सर हंसी- मजाक में कहती है सुनिए पंडित जी मैं आपके उन छःबेटियों जैसी नहीं हूं जो आपकी हां में हां मिलातीे हैं । आप उन्हें डांट- फटकार भी देते हैं वह मुंह बनाकर चली जाती हैं ।मेरी सभी छोटी बड़ी बहनों से रेरी- तेरी में आप बात किया करते हो।वो जैसे बालिका विद्यालय की शिक्षिका ना होकर चपरासी हों। आपसे बडे़बाबू डरते होंगे ,प्रधानाचार्य दीदी डरती होंगी पर मैं डरने वाली नहीं ।मेरा नाम सम्मान के साथ लिया करिए। मुझे आपकी रेेरी- तेरी पसंद नहीं है ।तब मैं हंसकर कहता मुझे माफ करना मेरी मां ।आज से मैं तुझे तेरे नाम के साथ सम्मान पूर्वक ही बुलाया करूंगा। वह खिलखिला कर हंस देती और अपनी बहनों से कहती देखो दीदी बुड्ढे की अकल ठिकाने आ गई ना । मैं भी पीछे मुंह करके हंस देता था। कभी-कभी मैं सोचता कि मेरी छः बेटियां मुझसे कितना डरती हैं ,पर यह तो मुझे ही डरा देती है ।फिर मैं सोचता जरूर यह मेरे स्वभाव जैसे अक्खड़ स्वभाव की है ,तभी तो मेरी इसके सामने बोलती बंद हो जाती है।
यूं ही इस बालिका विद्यालय में इन सभीे बेटियों के साथ लड़ते -झगड़ते मेरे इतने बरस बीत गए और उम्र का पता नहीं चला। इस विद्यालय में मुझे जितना सम्मान मिला उतना शायद किसी बड़े अधिकारी को भी ना मिला होगा। कहने को तो मैं चतुर्थ श्रेणी का चौकीदार हूँ पर मेरा रुतबा विद्यालय के प्रबंधक से भी अधिक है । मैं जब चाहूं जिसको भी डांट फटकार दूं वह चाहे प्रधानाचार्य हो या शिक्षक- शिक्षिका कोई मेरी बातों का बुरा नहीं मानता। ऐसा हंसता खेलता परिवार शायद बिड़ले लोगों को मिलता होगा। जहां पर बड़े से लेकर छोटे पद पर काम करने वाले शिक्षक ,अधिकारी एवं कर्मचारी मेरी जरूरत से ज्यादा इज्जत वा सम्मान करते हैं ।पंडित जी बातों बातों में अक्सर कहा करते थे मैं बड़ा भाग्यशाली जिसके एक नहीं सात-सात बेटियां हैं। शादीशुदा ना होते हुए भी सात-सात बेटियों का बाप होना मेरे लिए बडे़ गर्व की बात है। मै जब भगवान के पास जाऊंगा तो उनसे कहूंगा मुझे एक जनम नहीं सात -सात जनम तक इन सात प्यारी बेटियों का बाप बनाना । इस जनम में ये मेरा इतना ख्याल रख रहीं हैं पर आगे के जनमों में मेरे राम मुझे इतना काबिल एवं संपन्न बनाना कि मैं इनका ख्याल रख सकूं। अब मैं अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में पहुंच चुका हूँ ,जीवन का कोई भरोसा नहीं है ,आज भी जा सकता हूं और चार -छः साल भी चल सकता हूं । यह तो मरेे राम को पता है वही जानता है ,मुझे कब तक अपनी इन बेटियों के बीच रहना है । मेरी यही इच्छा है कि मेरे ये सात बेटियां यूं ही हंसी खुशी से रहें । इन पर कभी कोई तकलीफ ना आए।मेरे सामने भी और मेरे जाने के बाद भी। कभी-कभी यह सब सोच कर मेरा दिल घबरा जाता है मेरे ना रहने पर इन सबको डांटेगा कौन ?यह तो अनाथ हो जाएंगीे ,बिन बाप की हो जाएगीं। तभी मुझे ध्यान आता है मेरा राम तो है जो मेरा भी बाप है और मेरी इन बेटियों का भी ।वहीं इनका ख्याल रखेगा जो अब तक मेरा रखता आया है। इन्हें मेरी कमी का एहसास थोड़े ही होने देगा। जब कभी भी मेरी बेटियों को मेरी याद आएगी तो यह उनके आंसू भी पोछेगा और उन्हें सांत्वना भी देगा मत रो बेटी तेरा बाप ऊपर दुखी होगा ।

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