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भारत में पत्रकारिता का विकास एक नजर में।

जनवाद टाइम्स 30 May 2021
Establishment of egalitarian society in independent India depended on Dhanna Seth: Dr. Dharmendra Kumar

Establishment of egalitarian society in independent India depended on Dhanna Seth: Dr. Dharmendra Kumar

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लेखक- डॉ धर्मेंद्र कुमार
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में समाचार पत्रों का विकास 18 वीं सदी में प्रारंभ हुआ जब आंग्ल यूरोपीयनो ने अपनी पत्र पत्रिकाएं आरंभ की जिनका उद्देश्य सूचना व रोचकता था l वारेन हेस्टिंग्स के समय 1780 में ‘बंगाल गजट ‘ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन “हिक्की” ने किया जहां वारेन हेस्टिंग्स का विरोध तथा आलोचना होती थी l मिस्टर “हिक्की ” को कैद कर लिया और 1782 में पत्रिका बंद करनी पड़ी l Lord Karan valis के काल में मिस्टर “डुएन” जो “इंडियन वर्ल्ड” के संपादक थे जिन्होंने लार्ड कार्नवालिस की आलोचना की लार्ड कार्नवालिस अपना अपमान बर्दाश्त न कर सका और “डुएन “को बंदी बनाकर कुछ समय बाद देश निकाला कर दिया l इसी काल में 1770 में ‘मैकेनली’ जो “टेलीग्राफ” का संपादक था एक आलोचनात्मक लेख लिख कर अधिकारियों को नाराज कर दिया उसी वर्ष “कोलकाता गजट” के संपादक पर अभियोग लगाकर आरोपित किया l उसके बाद 1799 में लार्ड वेलेजली काल में समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया और कहा कि संपादक तथा स्वामियों के नाम से पेपर प्रकाशित हो l सरकार ने बंगाल ” किरकारू ” के संपादक “चार्ल्स मैक्लीन” के विरुद्ध कार्रवाई की l “मैक्लीन के अड़ियल स्वभाव तथा न्यायालय हस्तक्षेप के बाद लार्ड वेलेजली को इस्तीफा देना पड़ा l “लॉर्ड मिंटो” काल में कोई खास परिवर्तन नहीं हुए 1813 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने सेंसर के नियमों में छूट प्रदान की और 5 वर्ष बाद उसने सेंसर का पद खत्म कर दिया l समाचार पत्र पूर्ण रुप से स्वतंत्र हो गए l सेंसर समाप्त के बाद नए समाचार पत्र अस्तित्व में आए जे .एस .बकिंघम ने 1818 में “कोलकाता जनरल” निकाला अंत में उसे हिक्की तथा डूऐन के समान देश से निर्वासित कर दिया l टॉमस मुनरो को भारत सरकार ने समाचार पत्रों की जांच करने के लिए नियुक्त किया जिसने समाचार पत्रों पर सेंसर तथा उनके संपादकों को देश निकालें के अधिकार की सिफारिश की l थामस मुनरो की सिफारिश के बाद नए नियमों के रजिस्ट्रेशन के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख 1823 में प्रस्तुत किया गया जिसमें व्यवस्था की गई कोई नया छापाखाना स्थापित नहीं होगा तथा कोई समाचार पत्र तथा पुस्तक प्रकाशित होने पर पाबंदी लगा दी तब राजा राममोहन राय तथा द्वारकानाथ ठाकुर ने विरोध किया कि 15 अप्रैल 1823 को वही नियम रजिस्टर कर जारी कर दिया l1835 में चार्ल्स मैटकाफ ने इसे रद्द कर दियाl इस कार्य में तात्कालिक विधि सदस्य लॉर्ड मैकाले ने सहायता दी और समाचार पत्र स्वतंत्र हो गए l 1857 में जब गदर हुआ तब 1857 लाइसेंस अधिनियम के तहत समाचार पत्रों पर पाबंदियां लगा दी यह 1857 का 15 अधिनियम था किंतु नियम शीघ्र ही वापस ले लिया गया 1860 में ‘बंगाली’ तथा ‘अमृत बाजार पत्रिका’ तथा बंगाल में “अखबार ए आम” लाहौर में साप्ताहिक पत्र प्रकाशित हुए 1867 के अधिनियम के तहत छापेखाने तथा समाचार पत्र अधिनियम अधिनियम को लागू करने के उद्देश्य से पाबंदी लगा दी 1878 का भारतीय भाषा समाचार पत्र अधिनियम के तहत लॉर्ड लिटन ने भारतीय राज्य सचिव को तार भेजा कि प्रेस कानून पर अपनी स्वीकृति दे ,जो 1780 आयरलैंड के दमन अधिनियम की शैली पर बनाया गया जिसमें मुद्रक को इस बात का विकल्प दिया गया कि सरकारी सेंसर को जरूर भेजें जिसका सर एयरवटनाथ तथा एस एन बनर्जी ने विरोध किया विरोध स्वरूप कोलकाता के टाउन हॉल में सभा हुई जिसने इस देसी अधिनियम को खत्म करने का प्रयास किया फिरोज शाह मेहता ने “टाइम्स ऑफ इंडिया “में एक लेख के माध्यम से सरकार की आलोचना की मिस्टर हाव हाउस तथा सर अर्शकिन पेरी जो राज्य सचिव की काउंसिल के सदस्य थे इस देसी कानून की कड़ी आलोचना की l 1880 में मंत्रिमंडल में परिवर्तन हुआ और लॉर्ड लिटन के स्थान पर लॉर्ड रिपन को उत्तराधिकारी बनाया गया उसने 1888 में यह कानून रद्द कर दियाl 1908 में समाचार पत्र अपराधों को भड़काने वाला अधिनियम स्वीकृत किया गया जिसमें मजिस्ट्रेट को छापाखाना को जप्त करने का अधिकार दिया गया जिसमें “युगांतर”” संध्या” तथा “वंदे मातरम” का प्रकाशन बंद हो गया l 1910 में भारतीय मुद्रणालय अधिनियम बना जिसके ते प्रकाशक को 500, 2000 ,5000 की सिक्योरिटी जमा करने का प्रावधान किया गया l डाकखाने तथा चुंगी पर माल रोकने का अधिकार दिया गया l “अमृत बाजार पत्रिका” ” मुंबई क्रॉनिकल” ” दी हिंदू” ” ट्रिब्यून” ” दी पंजाबी” हिंदी समाचार पत्रों पर प्रभाव पड़ा 1919 में भारत सरकार अधिनियम की स्वीकृति के बाद प्रथम भारतीय कानून सदस्य सर तेज बहादुर सप्रू को कानूनी सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया समिति की सिफारिश पर अधिनियम रद्द कर दिया गया l इंडियन नेशनल कांग्रेस के 1929 लाहौर अधिवेशन में 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया और 1930 में नागरिक अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हुआ l 1929 में समाचार संकटकालीन अधिनियम स्वीकृत हुआ जिससे प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी गई l 1932 का विदेश संबंध अधिनियम तथा 1934 में भारतीय सुरक्षा अधिनियम में 6 वर्षों तक मुद्रणालय तथा समाचार पत्रों को सरकार के नियंत्रण में रखने का अधिकार मिला l 1848 में “प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया “का निर्माण हुआ 1948 में भारत समाचार ने समाचार पत्र कानूनी जांच समिति बनाई जिसके प्रधान “गंगानाथ झा ” थे l1950 में संविधान लागू होने पर 19 अनुच्छेद में प्रेस को विस्तृत अधिकार मिले समाचार पत्र आपत्तिजनक सामग्री अधिनियम 1951 में व्यवस्था की गई कि समाचार पत्र 1931 के आपत्तिजनक अंशो से मुक्त होगा l 23 दिसंबर 1952 को “प्रेस आयोग ” की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष न्यायाधीश “एस राजाध्यक्ष ” थे l उसी समय से प्रेस अपना स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही है किंतु अब वह अपना अस्तित्व खोती जा रही है हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं l

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