Ambedkar Nagar News : नाग पंचमी पर्व पर प्रकाश सांप की जनेऊ बना हुआ है ।शिव को नागेश्वर कहा जाता हैअड़गड़ानंद महाराज जी
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Ambedkar Nagar News : नाग पंचमी पर्व पर प्रकाश सांप की जनेऊ बना हुआ है ।शिव को नागेश्वर कहा जाता हैअड़गड़ानंद महाराज जी

संवाददाता : अम्बेडकर नगर

विश्व गुरु विश्व गौरव से सम्मानित यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने नाग पंचमी पर्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्वास ही नाग है श्वास का निरोध करना ही नाग पूजा है । शब्द स्पर्श रूप रस गंध को समेट कर श्वास के माध्यम से भजन चिंतन करना ही नाग पूजा है ।

 

Ambedkar Nagar News : नाग पंचमी पर्व पर प्रकाश सांप की जनेऊ बना हुआ है ।शिव को नागेश्वर कहा जाता हैअड़गड़ानंद महाराज जीश्वास के द्वारा भजन करने पर ही स्वरूप की प्राप्ति होती है । विष्णु क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे हुए हैं। भगवान शिव की जटा में गले में और भुजा में सांप लिपटा हुआ है । सांप की जनेऊ बना हुआ है ।शिव को नागेश्वर कहा जाता है । शिव ही सद्गुरु होता है या सद्गुरु शिव स्वरूप में होता है ‌। संसार के समस्त समस्याओं का निवारण करने की क्षमता शिव स्वरूप सद्गुरु में होती हैं अर्थात सद्गुरु भव रोगों का वैद्य होता है । संसार की सारी जानकारी व संसार के भवरोगों का इलाज सद्गुरु रूपी वैद्य के पास होता है।

 

Ambedkar Nagar News : नाग पंचमी पर्व पर प्रकाश सांप की जनेऊ बना हुआ है ।शिव को नागेश्वर कहा जाता हैअड़गड़ानंद महाराज जीकहा गया है कि सद्गुरु वैद्य बचन विश्वासा।
संयम यह न विषय कै आशा।
अर्थात श्वास से भजन करना श्वास से ध्यान चिंतन करना धीरे धीरे साधक में ईश्वरी गुणधर्मों उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती हैं और साधक धीरे धीरे स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है ।नाग को दूध पिलाने का अर्थ है कि ईश्वरीय गुण ही दूध है । श्वास से भजन करते करते साधक के अंतराल में ईश्वरीय गुण धर्म उतरने लग जाते हैं । महापुरुषों ने श्वास से भजन पर ही बल दिया है महापुरुषों ने श्वास को मणि की संज्ञा दी है।
हीरा जैसी स्वासा बातों में बीता जाएl
श्वास श्वास पर राम कहु वृथा श्वास जनि खोए ।
ना जाने इस श्वास की आवन होय ना होय।
श्वास से भजन करते करते साधक के हृदय में कलुषित विचार समाप्त हो जाते हैं साधक का हृदय ईश्वरी गुणधर्मों से सना हुआ मिलता है । श्वास के यजन को ही गीता में प्राणायाम कहा गया है प्राणों का आयाम ही प्राणायाम है ।पंचमी मतलब स्वामी जी ने बताया कि पंचमी का अर्थ है शब्द स्पर्श रूप रस गंध जो बहिर्मुखी विचरण कर रही हैं वह साधक के अंतः करण में परमात्मा में अंतर्मुखी होकर भजन चिंतन में प्रवृत्त हो जाती हैं और साधक धीरे-धीरे साधना करते करते सद्गुरु स्वरूप में खड़ा हो जाता हैै । स्वामी जी ने बताया कि संसार ही समुद्र है इंद्रियां जब बहिर्मुखी होती हैं तो साधक का हृदय कलुषितहो जाता है जब श्री कृष्ण अर्थात सद्गुरु की कृपा से स्वास प्रस्वास का यजन कर साधक योग रुपी यमुना में यजन करता है भजन चिंतन करता है तो संसार रूपी सर्प को सद्गुरु कृपा से नाथ कर बहिर्मुखी इंद्रियों को अंतर्मुखी कर लेता है और वह ईश्वरीय गुण धर्मों से ओतप्रोत हो जाते हैं जिससे साधक के अंतराल में विषय रूपी वारी स्वच्छ निर्मल हो जाते हैं और साधक साधना के माध्यम से सद्गुरु के रूप में खड़ा हो जाता है ।