संवाददाता राजेन्द्र कुमार
वैशाली /कितना उच्च वह नैतिक धरातल था जब सन् १९९९ में गैसाल रेल दुर्घटना पर आदरणीय शास्त्री जी अनुकरण करते हुए नीतीश जी ने त्यागपत्र दे दिया जो अटल जी द्वारा काफी मान मनौव्वल करने के बाद ही उन्होंने वापस लिया था।सैद्धांतिक मतभेद होने के बाद त्यागपत्र देने की परम्परा कोई नहीं है।आजादी के तुरत बाद सैद्धांतिक मतभेद होने पर डा०लोहिया,लोकनायक जयप्रकाश नारायण,डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी,आचार्य कृपलानी इत्यादि ने भी पार्टी छोड़ी और नई पार्टी बनाई।कुछ काल बाद राजाजी ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाई।

इन लोगों पर कभी भी अवसरवादिता का आरोप नहीं लगा न ही लग सकता था क्योंकि ये लोग सत्ताधारी दल को छोड़ कर अलग हुए और जहाँ गए (नई पार्टी बनाई) वहाँ तत्काल सत्ता सुख मिलने वाला नहीं था।कुछ ऐसी ही स्थिति थी अटल-अडवाणी के साथ।जब उन्होंने जनता पार्टी छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी बनाई तो न जनता पार्टी सत्ता में थी न ही भाजपा को तुरत सत्ता मिलने वाली थी।और तो और जब नीतीश जी ने जार्ज फ़र्नाडिस के साथ जब जनता दल छोड़ कर समता पार्टी बनाया थे तब भी सामने सत्ता का नहीं संघर्ष का ही मार्ग था।

कितने उच्चे आदर्श थे!
परन्तु क्या हो गया उन आदर्शों का!नीतीशजी स्वयं के आदर्शों के मानकों को स्वयं ही तोड़ा और तोड़ते चले गए और आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए!
माना कि नरेंद्र मोदीजी से आपका सैद्धांतिक मतभेद था इसलिए २०१३ में आपने भाजपा का साथ छोड़ा।यहाँ तक तो नीति और सिद्धांत की बात थी ।परन्तु चुनाव तो आप भाजपा गठबंधन में ही जीत कर आये थे तो आपको पद से इस्तीफ़ा दे कर पुन: चुनाव में जाना चाहिए था।परन्तु आपने शार्टकट चुना और राजद और कांग्रेस के समर्थन से कुर्सी पर काबिज रहे।यह आपके स्खलन का प्रथम अध्याय था।
लेकिन २०१४ के लोकसभा के चुनाव में राजद और कांग्रेस के गठबंधन में चुनाव नहीं लड़े।क्योंकि आपको मुगालता था कि आपके लिए बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनने का सुनहरा मौका है।लेकिन आप ४० में २ सीटों पर सिमट गए।यह दूसरा अध्याय था।
२०१५ के बिधान सभा चुनावों में आर राजद-कांग्रेस के गठबंधन में चुनाव लड़े और विजयी हो गए।परन्तु यह आपके स्खलन का तीसरा अध्याय था।
मुख्यमंत्री आप बन गए तो पाँच साल सरकार चलाते और यदि गठबंधन में सैंद्धांतिक मतभेद उभर आये थे या आपके सहयोगियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे तो आप इस्तीफ़ा दे कर पुन: चुनाव में जाते।परन्तु आपने गठबंधन बदल लिया।निश्चित ही यह पाप आपके पतन का चौथा अध्याय था।इस पाप में जो आपका सहयोगी बना वह भी पाप का भागी बना,उसे भी तो कर्मफल भोगना ही था।
यह आपके पतन का पाँचवाँ अध्याय है जिसमें विधि ने आपके द्वारा ही आपके पाप के भागी को भी सजा दिलवाई है।परन्तु आप खुद सोचिए सत्यनारायण की कथा भी पाँच अध्याय में समाप्त हो जाती है तो झूठनारायण की कथा कब तक चलने वाली है।
याद कीजिए जब आप संघर्ष और सत्य के मार्ग पर चलते रहे तब आप बढ़ते गए।१९९४ के ७ सीटों से बढ़ कर २०१० में स्वयं ११५ सीट पाये और सहयोगी को भी ९१ सीट मिला।जब से झूठनारायण बन कर पाला बदल खेलने लगे २०१० के ११५ सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी से आप ४३ के साथ तीसरी पार्टी हैं।आगे का तो भगवान ही मालिक है।वैसे यदि चंद्रबाबु नायडू का पता ठिकाना मिल जाय तो जरा सलाह ले लीजिएगा ।
हाँ,चलते चलाते आपको,आपके गठबंधन और मीडिया में आपके दोस्तों को बताता चलूँ कि महाराष्ट्र से आपकी तुलना इसलिए गलत है कि वहाँ उद्धव ठाकरे जनादेश से दूर गए थे जिसे एकनाथ शिंदे ने दुरुस्त किया है,यहाँ आप जनादेश से दूर गए हैं।आपने शिंदे के मार्ग पर कदम नहीं बढ़ाया है आपने ठाकरे के पथ पर पद रखा है।