संवाददाता रिषीपाल सिंह
इटावा विकासखंड बसरेहर के अंतर्गत आज गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व के उपलक्ष में कई धार्मिक स्थानों पर भंडारे का आयोजन किया गया वही ग्राम अकबरपुर में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत का आज समापन दिवस था वहां पर भी भंडारे का आयोजन किया गया वही बसरेहर में कल्लाबाग स्थित मंदिर पर भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भंडारे का आयोजन किया।

वही राम बिहारी शाला पर भी प्रसाद वितरण किया गया विकासखंड बसरेहर के अंतर्गत ग्राम लुधपुरा में शिव मंदिर पर भंडारे का आयोजन किया गया वही ग्राम सराय मलपुरा में कबीरपंथी शाला पर भंडारे का आयोजन किया गया जहां पर हजारों की संख्या में पहुंचकर श्रद्धालुओं ने गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर प्रसाद ग्रहण किया।
जानिए क्यों मनाते है गुरुपूर्णिमा
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।
अर्थात गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश है। गुरु तो परम ब्रह्म के समान होता है, ऐसे गुरु को मेरा प्रणाम। हिन्दू धर्म में गुरु की बहुत महत्ता बताई गई। गुरु का स्थान समाज में सर्वोपरि है। गुरु उस चमकते हुए चंद्र के समान होता है, जो अंधेरे में रोशनी देकर अपने शिष्यों के पथ-प्रदर्शन करता है। गुरु के समान अन्य कोई नहीं होता है, और न ही कोई गुरु का स्थान ग्रहण कर सकता है। क्योंकि गुरु भगवान तक जाने का मार्ग बताता है।

कबीर ने गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए कहते है कि-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय,
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।
गुरु पूर्णिमा हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व है। गुरु पूर्णिमा, गुरु की आराधना का दिन होता है। गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे यह कारण है कि इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। जिन्हें हम कृष्णद्वैपायन के नाम से भी जानते है। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों और महाभारत की रचना की थी। हिन्दू धर्म में वेदव्यास को भगवान के रूप में पूजा जाता है। इस दिन वेदव्यास का जन्म होने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा को अन्य नाम आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और मुडिया पूनो के नाम से भी जाना जाता है। जिसे लोग त्योहार की तरह मनाते हैं। यह संधिकाल होता है, क्योंकि इस समय के बाद से बारिश में तेजी आ जाती है। पुरातन काल में ऋषि मुनि, साधु, संत एक स्थान से दूसरे स्थान यात्रा करते थे। बारिश के समय वे 4 माह के लिए किसी एक स्थान पर रुक जाते थे। आषाढ़ की पूर्णिमा से 4 माह तक रुकते थे, यही कारण है कि इन्हीं 4 महीनों में प्रमुख व्रत त्योहार आते हैं।