Agra न्यूज़ :युवा मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों का मंथन, भावनात्मक शिक्षा को बताया समय की आवश्यकता
संवाददाता मुस्कान सिंह
आगरा, 6 सितंबर 2026। युवा मानसिक स्वास्थ्य एवं भावनात्मक शिक्षा को लेकर प्रिल्यूड पब्लिक स्कूल, ई-क्यूब लैब (E-Cube Lab) एवं फीलिंग माइंड्स द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए मनोविज्ञान एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने युवाओं के सामने उभर रही मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों और उनके समाधान के लिए प्रभावी सहयोग तंत्र विकसित करने पर विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. नवीन कुमार, प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय रहे। इस अवसर पर प्रो. आराधना शुक्ला, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मनोविज्ञान, कुमाऊं विश्वविद्यालय, एसएसजे कैंपस अल्मोड़ा, डॉ. कल्पना श्रीवास्तव, निदेशक, एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल हेल्थ एंड अलाइड साइंसेज तथा डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय, असिस्टेंट प्रोफेसर, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने अपने विचार साझा किए।

दो महत्वपूर्ण विषयों पर हुई पैनल चर्चा
कार्यक्रम के दौरान “युवा मानसिक स्वास्थ्य—उभरती चिंताएं एवं चुनौतियां” तथा “युवा मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहयोग तंत्र का निर्माण” विषयों पर दो महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं आयोजित की गईं।
दोनों पैनल चर्चाओं में डॉ. दीप्तिमाला अग्रवाल, डॉ. रेणु अग्रवाल एवं डॉ. तृप्ति सखूजा ने पैनलिस्ट के रूप में सहभागिता की। उन्होंने युवा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने अनुभव और विशेषज्ञ दृष्टिकोण साझा किए।
वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में युवा शैक्षणिक एवं करियर संबंधी दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं, डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव, संबंधों से जुड़ी चुनौतियों, पहचान संबंधी प्रश्नों तथा भविष्य की अनिश्चितताओं जैसी अनेक परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी के उपचार तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। युवाओं में आत्म-जागरूकता, भावनात्मक समझ, लचीलापन और सकारात्मक सोच विकसित करना भी जरूरी है।
युवाओं को सुनने और समझने की जरूरत

विशेषज्ञों ने कहा कि युवाओं को केवल सलाह देने के बजाय उनकी बात को ध्यानपूर्वक सुनना और समझना आवश्यक है। उन्हें ऐसा सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे बिना किसी डर या पूर्वाग्रह के अपनी भावनाओं और समस्याओं को व्यक्त कर सकें।
उन्होंने कहा कि परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय, शिक्षक, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समुदाय को मिलकर युवाओं के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम तैयार करना होगा। समय रहते भावनात्मक समस्याओं को समझना और उचित सहयोग उपलब्ध कराना युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
भावनात्मक शिक्षा को अनुभवात्मक बनाने पर जोर
इस अवसर पर ISMHAA (Indian Society of Mental Health Awareness & Advancement) के उपाध्यक्ष डॉ. सुशील गुप्ता एवं अध्यक्ष डॉ. चीनू अग्रवाल ने भी युवा मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता तथा सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर विचार रखे।
कार्यक्रम में Sharachi के संस्थापक एवं E-Cube Lab के Creator श्री शैलेश कुमार जिंदल ने भावनात्मक शिक्षा को अनुभवात्मक एवं व्यावहारिक बनाने की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ई-क्यूब लैब का उद्देश्य बच्चों और युवाओं को भावनाओं से संबंधित केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें अनुभव के माध्यम से अपनी भावनाओं को समझने और प्रभावी ढंग से व्यक्त एवं प्रबंधित करने के कौशल विकसित करने का अवसर देना है।
Emotional Education Lab) का भी अवलोकन कराया गया। विशेषज्ञों और उपस्थित लोगों ने लैब की कार्यप्रणाली तथा भावनात्मक शिक्षा को व्यवहारिक रूप से विकसित करने की अवधारणा को समझा।
शिक्षक दिवस पर प्रधानाचार्यों एवं विद्यालय प्रमुखों का सम्मान
कार्यक्रम के अगले चरण में शिक्षक दिवस समारोह आयोजित किया गया। इसमें शिक्षा एवं युवा कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रधानाचार्यों एवं विद्यालय प्रमुखों को सम्मानित किया गया।
आयोजकों ने कहा कि युवा मानसिक स्वास्थ्य केवल चिकित्सकीय विषय नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और समाज की साझा जिम्मेदारी है। बच्चों और युवाओं को भावनात्मक रूप से सक्षम बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था में भावनात्मक अधिगम एवं जीवन कौशल को उचित स्थान दिया जाना आवश्यक है।
प्रेस वार्ता के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम का समापन प्रेस वार्ता के साथ हुआ। इस दौरान विशेषज्ञों एवं आयोजकों ने युवा मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक शिक्षा को विद्यालयी एवं सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि यदि बच्चों और युवाओं को कम उम्र से ही अपनी भावनाओं को पहचानने, समझने और स्वस्थ तरीके से व्यक्त करने की शिक्षा दी जाए, तो वे भविष्य की चुनौतियों का अधिक आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सामना कर सकते हैं।
डॉ. सुशील गुप्ता ने कहा कि भावनात्मक रूप से मजबूत और संवेदनशील युवा ही स्वस्थ समाज की नींव तैयार कर सकते हैं। इसके लिए विद्यालय, परिवार और समाज को मिलकर निरंतर प्रयास करने होंगे।