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आप मुंह मांगी दुआ, हम अनसुनी फरियाद है

लेखक धर्मेंद्र कुमार

आज सत्य को परेशान ही नहीं पराजित भी होना पड़ रहा है l खोटी मुद्रा ने अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया है l शराब खाने महक रहे हैं l बार बालाएं अपनी जिस्मानी नुमाइश का जलवा बिखेर रही हैं l खाने की प्लेटों में बचे हुए कबाब का भी अपना भाग्य है कि वह नाली के रास्ते गटर में चला जाएगा l

लोग कहते हैं कि भारत सोने की चिड़िया था दूध दही की नदियां बहती थी किंतु यह भाग्य के अभागे उस समय सोने की चिड़िया के दर्शन नहीं कर पाए, ना दूध दही का स्वाद चख पाएं l तब भूके के यह आज भी भूखे हैं और भविष्य भूखों मरने का इंतजार कर रहा है lना उस युग मैं इनकी सुनी गई और ना इस युग में l बस सोच कर कि- “सोचा था कभी फूल खिलेंगे बहार में” जैसी आशावादी सोच उनका निरंतर जीवन संचालित कर रही है l

शिक्षा का महत्व उनसे पूछिए जो जुगाड़ से लेखपाल, बैंक कर्मी ,पुलिसकर्मी या प्रशासन कर्मी बन गए हैं लेकिन उनसे भी पूछ लीजिएगा जिन्होंने अपनी शिक्षा के चलते मां-बाप को शरीर भर वस्त्र धारण नहीं करने दिया है, पेट भर खाना नहीं खाने दिया l उच्च शिक्षा प्राप्त कर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं l शासन भी है ,प्रशासन भी है, न्याय व्यवस्था भी मौजूद है, व्यवस्थापिका रोज नए विधान बनाकर मंचों से मूछें तरेर रही है l किंतु पढ़े-लिखे लोग सिर्फ तमाशबीन तथा हताश बने हुए हैं l सत्ता का मानना है कि इनके मरने से कुनबा खाली नहीं होगा l

सूदखोर का ब्याज चुकाते चुकाते जमींदार को लगान देते किसान की पीढ़ियां गुजर गई l वर्तमान में तीनों कृषि बिलो का विरोध कर रहे हैं l सरकार बता रही है कि हम आय दोगुनी कर रहे हैं l किसान कह रहा है कि हम आकंठ कर्ज में डूब कर खेती से हाथ धो बैठेंगेl किसकी सही माने l हमें तो सत्ता की ही सही माननी पड़ेगी क्योंकि सत्ता और उसकी कठपुतली न्यायपालिका दोनों एक हैं l उनका मानना है कि- राम कहो आराम मिलेगा, सुबह नहीं तो शाम मिलेगा l आपको बिलों की चिंता नहीं करनी चाहिए l

किसान के पैर में आज भी नया जूता आने पर खुद को खुशनसीब मानता है l दूसरी और लग्जरी कारें उसके लिए सिर्फ स्वप्न हैं l मजदूर तो अपना रोज लाने और खाने में व्यस्त है lयदि थक जाएगा तो देसी शराब उसकी तमाम गमों को पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देगी l

सड़क किनारे भूखे नंगे लोग बस्ती में क्यों इकट्ठे हैं सोचा इनसे पूछे कि जिंदगी कैसे गुजर रही है l सोने की चिड़िया तथा दूध दही की नदियों के आपने दर्शन क्यों नहीं किए l पूछने पर जवाब मिला -चिड़िया मेरी पॉलिथीन की झोपड़ी में नहीं बैठेगी तथा दूध दही की नदियां हमारे जाने से पहले कुछ मठाधीशओ ने पी ली थी l इसलिए हम आज भी प्यासे हैं l हम न्याय मांग रहे हैं किंतु न्याय व्यवस्था सरकार के इशारे पर मौन है l हमें बेहतर जीवन देने वाले हमारी मौत के सौदागर हैं l हम सब अनसुनी फरियाद हैं l चंद मुट्ठी भर लोग मुंह मांगी दुआएं हैं l

अनायास आभास हुआ कि

जब वृक्षों के फल आ गए, पत्थरों का भला हो गया l
एक मुजरिम है मुंसिफ भला ,छोड़िए फैसला हो गयाll