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अम्बेडकर नगर न्यूज टी बी शो हल्दी रस्म रिवाज देख कर गांव में प्रचलन फिजूल खर्ची अमीरों के चक्कर में बेचारा गरीब परेशान

जनवाद टाइम्स 12 March 2024
Seeing Ambedkar Nagar News TV show Haldi rituals and customs, the poor are troubled due to wasteful expenditure of the rich.
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संवाददाता पंकज कुमार

अम्बेडकर नगर जिले के विकास खण्ड़ जहांगीरगंज गांव के क्षेत्रों में लोग टीबी शो हल्दी रस्म रिवाज देख कर गांव देहात प्रचलन लोग उस रस्म पूरा करने में गरीब के परिवार परेशान। गांव देहात ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां- बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं।

Seeing Ambedkar Nagar News TV show Haldi rituals and customs, the poor are troubled due to wasteful expenditure of the rich.

आपको बता दें कि पंकज कुमार ने बताया कि इस कलयुग के दौर में लोग एक-दूसरे देख नकल कर आगे बढ़ रहे सभी रीति रिवाज में शहर का रिवाज गांव देहात में तेजी चल रहा है आज कल ग्रामीण गांव जवार परिवेश में होने वाली विवाह शादियों में एक है। नई रस्म का जन्म हुआ है-हल्दी-रस्म।हल्दी रिवाज रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है। उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पौत्त (पीले) वस्त्र धारण करते हैं। लगभग साल 2019 से पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन टीबी शो में देख और चल रहा था लेकिन अब दिल्ली हरियाणा पंजाब राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता था, लेकिन पिछले दो- तीन साल से इसका प्रचलन बहुत तेजी से ग्रामोपा क्षेत्र में बढ़ा है।पहले हल्दी की रस्म के पीछे कोई दिखावा नहीं होता था। बल्कि तार्किकता होती थी। पहले गांवो दिहात क्षेत्रों में आज की तरह साबुन व शैम्पू नहीं थे और ना ही ब्यूटी पार्लर था। इसलिए हल्दी के उबटन से पिसधिस कर दूल्हे-दुल्हन के चेहरे व शरीर से मृत चमड़ी और मेल को हटाने।नेहरे को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटा, दूध से तैयार उबटन का प्रयोग करते थे। ताकि दूल्हा-दुल्हन सुंदर लगे। इस काम की जिम्मेदारी घर- परिवार की महिलाओं की थी। लेकिन समय आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड, दिखावटी और मंहगी हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महिला, पुरुषों हूँ महगे पीले वस्त्र पहने जाते है। दूल्हा दुलहन के घर जाता है और पूरे वातावरण, कार्यक्रम को पीताम्बरी बनाने के भरसक प्रयास किये जाते हैं। यह पीला ड्रामा घर के मुखिया के माधे पर तनाव की लकीरें खींचता है जिससे चिंतामय पसीना टपकता है।पुराने समय में जहां कच्ची छतों के नीचे पक्के इरादों के साथ दूल्हा-दुल्हन बिना किसी दिखावे के फेरे लेकर अपना जीवन आनंद के साथ शुरू करते थे, लेकिन आज पक्के इरादे कम और दिखावा और बनावटीपन ज्यादा होने लगा इस समय आजकल देखने में आ रहा है कि गांवों में आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस शहरी बनावटीपन में शामिल होकर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, बन साइड हेयर कटिंग वाले या लम्बे बालों वाले सिगरेट का धुंआ उड़ाते दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के लिए रोल बनाती है। बेटे के रील बनाने के चक्कर में बाप की कर्ज उतरने में ही रेल बन जाती है। गांवो क्षेत्रों में ऐसे घरों में फालतू खर्चो में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का दांचा खड़ा किया लेकिन ये लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां-बाप को हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं।जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां-बाप से जिद्द करके इस तरह की।फिजूल खची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि मित्र चच्चे (जिनकी शादी है) मां-बाप से कहते है आप कुछ नहीं जानते, आपको समझ नहीं है, आपकी सोच बही पुरानी अनपढ़ों वाली रहेगी। यह कहते हुए अपने माता-पिता को गंवारू, पिछड़ा, थे तो बौइस बरगा आदमी हो कहते हैं। मैं जब भी यह सुनता है सोचने को विवश हो जाता हूं, पांव अस्थिर हो जाते हैं।

बड़ी चिंता होती है कि मेरा युवा व छोटा भाई-बहिन किस दिशा में जा रहे हैं।आज किसी को चींटी के पैरों के घूंघरू को आवाज सुनने की फुर्सत नहीं है क्योंकि सब-के-सब फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर पर खुद को बढ़ा-चढ़ाकर कर परोसते हैं, दिखावटीपन की चासनी में आकंठ इने हुए है। इसलिए व्यक्ति बाजारों की गिरफ्त में जल्दी आता जा रहा है और कह पूर्णतः बाजारो द्वारा आजाद को हुई नई-नवेली रस्म है।इसका गला यहीं पर घोट दो अन्यथा पीसना तय अनेकों की तरह फिजूलखर्ची वाली रस्म को रोकने के समाचार पढ़ कर खुशी होती है लेकिन अपने घर, परिवार, समाज, गांव में ऐसे कार्यक्रम में शामिल होकर लुत्फ उठा रहे हैं, फोटो खिंचवाकर स्टेटस लगा रहे हैं। तुम अपने हर एक सांस के अह सासो मे मुझे पाओगे मैं हर पल तुमसे मिलने आया करूंगा।

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