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Prayagraj News आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी वस्तुओं को खरीदें-कुलपति

जनवाद टाइम्स 23 September 2025
Prayagraj News आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी वस्तुओं को खरीदें-कुलपति
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रिपोर्ट विजय कुमार

उ.प्र. राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के मानविकी विद्याशाखा के तत्वावधान में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में जन्मोत्सव पखवाड़े के अन्तर्गत वर्तमान युग में भारतीय ज्ञान-परम्परा की उपादेयता विषय पर एक वेबिनार/सेमिनार का आयोजन सोमवार को विश्वविद्यालय के सरस्वती परिसर स्थित तिलक शास्त्रार्थ सभागार में किया गया।

 

Prayagraj News आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी वस्तुओं को खरीदें-कुलपति
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विश्वविद्यालय एवं शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की संकल्पना आत्मनिर्भर भारत बनाने के परिप्रेक्ष्य में लोगों से स्वदेशी वस्तुओं को खरीदने का आह्वान किया। उन्होंने शिक्षार्थियों को कौशलपरक व स्वरोजगार परक शिक्षा देने के लिए आग्रह किया। कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने विश्वविद्यालय की सभी विद्याशाखाओं से आग्रह किया कि वे अपने पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का एक अध्याय निश्चित रूप से जोड़ें, जिससे हमारे शिक्षार्थी आधारभूत ज्ञान से परिचित हो सकें। उन्होंने शिक्षार्थियों के स्वावलंबी बनने पर जोर दिया। जिसके लिए उन्हें लघु उद्योग के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने के लिए कार्य योजना बनाई जानी चाहिए। कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने आयुर्वेद के क्षेत्र में भी कार्य करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुरूप वर्तमान परिप्रेक्ष्य को जानने की आवश्यकता है। अतीत के ज्ञान से भविष्य का निर्माण होता है। वैदिक वांङमय, उपनिषद, पुराण, आगम और तंत्र भाषा विज्ञान, संस्कृत, काव्य भाषाओं का साहित्य, आधुनिक भारतीय साहित्य भारतीय ज्ञान परम्परा के श्रोत है। प्रोफेसर शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा जीवन के सभी पहलुओं शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिकता को समग्र रूप से देखती है, जो एक संतुलित और परिपूर्ण जीवन के लिए आवश्यक है। यह परम्परा नैतिक मूल्यों सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती है जो आधुनिक भौतिकवाद और नैतिक क्षरण का प्रतिकार करती है। यह अपनी समृद्धि, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में सहायक है और लोगों को अपनी पहचान और मूल्यों को बनाये रखने में मदद करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय उपनिषद् भारतीय दर्शन का मूल स्रोत हैं। सभी तत्वों का समावेश है उन्होंने रामायण एवं महाभारत जैसे आदि काव्यों में उल्लेखित आदर्शों एवं मूल्यों पर चिन्तन पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर अरविन्द नारायण मिश्रा, शिक्षा शास्त्र विभाग, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में ऋषि मुनियों ने अपने शरीर को ही प्रयोगशाला बनाया और सम्पूर्ण जीवन को समाज और सनातन को समर्पित किया। भारत पर आक्रान्ताओं ने उनकी चिन्तन धारा और ज्ञान गंगा को दबाने और पीछे करने का प्रयास किया। स्वतंत्रता के बाद विशेष कर विगत कुछ वर्षों से भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रोफेसर मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के जनक ऋषियों ने अपने त्याग और समर्पण से लोक हित में चिन्तन आदर्शों और मूल्यों को स्थापित किया है। भारतीय ज्ञान परम्परा सामाजिक सदभाव, समरसता, पर्यावरण, संस्कृति, संस्कार आदि के भाव को शिखर पर पहुँचाते हैं।
कार्यक्रम के निदेशक प्रोफेसर सत्यपाल तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा की उपादेयता केवल भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की उपादेयता सिद्ध कर रही है। उन्होंने कहा कि प्राचीन ऋषि मुनियों ने तपस्या, जीवन पद्धति से विश्व का मार्गदर्शन किया। भारतीय ज्ञान परम्परा शोध और सिद्धान्तों की जनक रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा शांतिप्रिय रही है। हमारे मूल्य युद्ध नहीं चाहते थे। वेबिनार/सेमिनार के समन्वयक प्रोफेसर विनोद कुमार गुप्त ने वाचिक स्वागत एवं विषय प्रर्वतन करते हुए कहा कि आज का सामाजिक विखण्डन, पर्यावरणीय संकट आदि के सन्दर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा में अनेक समाधान प्रस्तुत किये गये हैं। जो आज उपादेय सिद्ध हो सकते हैं। इस अवसर पर शोध छात्राओं द्वारा कुलगीत प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र संस्कृत दिग्विजय सिंह ने तथा आयोजन सचिव डॉ. अतुल कुमार मिश्र ने आभार व्यक्त किया। सह आयोजन सचिव डा. दयानन्द उपाध्याय तथा संजीव भट्ट ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस अवसर पर समस्त विद्याशाखाओं के निदेशक, आचार्यगण, सह-आचार्यगण, सहायक आचार्यगण, शोधार्थी एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।

डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र
जनसंपर्क अधिकारीविवि में वर्तमान युग में भारतीय ज्ञान परम्परा की उपादेयता पर संगोष्ठी

 

उ.प्र. राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के मानविकी विद्याशाखा के तत्वावधान में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में जन्मोत्सव पखवाड़े के अन्तर्गत वर्तमान युग में भारतीय ज्ञान-परम्परा की उपादेयता विषय पर एक वेबिनार/सेमिनार का आयोजन सोमवार को विश्वविद्यालय के सरस्वती परिसर स्थित तिलक शास्त्रार्थ सभागार में किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विश्वविद्यालय एवं शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की संकल्पना आत्मनिर्भर भारत बनाने के परिप्रेक्ष्य में लोगों से स्वदेशी वस्तुओं को खरीदने का आह्वान किया। उन्होंने शिक्षार्थियों को कौशलपरक व स्वरोजगार परक शिक्षा देने के लिए आग्रह किया। कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने विश्वविद्यालय की सभी विद्याशाखाओं से आग्रह किया कि वे अपने पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का एक अध्याय निश्चित रूप से जोड़ें, जिससे हमारे शिक्षार्थी आधारभूत ज्ञान से परिचित हो सकें। उन्होंने शिक्षार्थियों के स्वावलंबी बनने पर जोर दिया। जिसके लिए उन्हें लघु उद्योग के क्षेत्र में प्रशिक्षण देने के लिए कार्य योजना बनाई जानी चाहिए। कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने आयुर्वेद के क्षेत्र में भी कार्य करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुरूप वर्तमान परिप्रेक्ष्य को जानने की आवश्यकता है। अतीत के ज्ञान से भविष्य का निर्माण होता है। वैदिक वांङमय, उपनिषद, पुराण, आगम और तंत्र भाषा विज्ञान, संस्कृत, काव्य भाषाओं का साहित्य, आधुनिक भारतीय साहित्य भारतीय ज्ञान परम्परा के श्रोत है। प्रोफेसर शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा जीवन के सभी पहलुओं शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिकता को समग्र रूप से देखती है, जो एक संतुलित और परिपूर्ण जीवन के लिए आवश्यक है। यह परम्परा नैतिक मूल्यों सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती है जो आधुनिक भौतिकवाद और नैतिक क्षरण का प्रतिकार करती है। यह अपनी समृद्धि, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में सहायक है और लोगों को अपनी पहचान और मूल्यों को बनाये रखने में मदद करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय उपनिषद् भारतीय दर्शन का मूल स्रोत हैं। सभी तत्वों का समावेश है उन्होंने रामायण एवं महाभारत जैसे आदि काव्यों में उल्लेखित आदर्शों एवं मूल्यों पर चिन्तन पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर अरविन्द नारायण मिश्रा, शिक्षा शास्त्र विभाग, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में ऋषि मुनियों ने अपने शरीर को ही प्रयोगशाला बनाया और सम्पूर्ण जीवन को समाज और सनातन को समर्पित किया। भारत पर आक्रान्ताओं ने उनकी चिन्तन धारा और ज्ञान गंगा को दबाने और पीछे करने का प्रयास किया। स्वतंत्रता के बाद विशेष कर विगत कुछ वर्षों से भारतीय ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रोफेसर मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के जनक ऋषियों ने अपने त्याग और समर्पण से लोक हित में चिन्तन आदर्शों और मूल्यों को स्थापित किया है। भारतीय ज्ञान परम्परा सामाजिक सदभाव, समरसता, पर्यावरण, संस्कृति, संस्कार आदि के भाव को शिखर पर पहुँचाते हैं।

Prayagraj News आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी वस्तुओं को खरीदें-कुलपति
कार्यक्रम के निदेशक प्रोफेसर सत्यपाल तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा की उपादेयता केवल भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की उपादेयता सिद्ध कर रही है। उन्होंने कहा कि प्राचीन ऋषि मुनियों ने तपस्या, जीवन पद्धति से विश्व का मार्गदर्शन किया। भारतीय ज्ञान परम्परा शोध और सिद्धान्तों की जनक रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा शांतिप्रिय रही है। हमारे मूल्य युद्ध नहीं चाहते थे। वेबिनार/सेमिनार के समन्वयक प्रोफेसर विनोद कुमार गुप्त ने वाचिक स्वागत एवं विषय प्रर्वतन करते हुए कहा कि आज का सामाजिक विखण्डन, पर्यावरणीय संकट आदि के सन्दर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा में अनेक समाधान प्रस्तुत किये गये हैं। जो आज उपादेय सिद्ध हो सकते हैं। इस अवसर पर शोध छात्राओं द्वारा कुलगीत प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र संस्कृत दिग्विजय सिंह ने तथा आयोजन सचिव डॉ. अतुल कुमार मिश्र ने आभार व्यक्त किया। सह आयोजन सचिव डा. दयानन्द उपाध्याय तथा संजीव भट्ट ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस अवसर पर समस्त विद्याशाखाओं के निदेशक, आचार्यगण, सह-आचार्यगण, सहायक आचार्यगण, शोधार्थी एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे।

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