IMG-20200927-WA0037
Share News

सुनील पांडेय -कार्यकारी संपादक

कहने को तो हमारा देश कृषि प्रधान देश है ,लेकिन असलियत में देंखे तो सदियों से किसानों का शोषण होता हुआ आया है और आगे भी होता रहेगा। शोषक बदलते गए पर शोषण का तरीका नहीं बदला । भारतीय इतिहास के पन्नों पर यदि नजर डालें तो आजादी के पहले अंग्रेजों एवं पुर्तगालियों ने , उसके पूर्व तुर्क एवं मुगल काल में तत्कालीन सुल्तानों एवं बादशाहों ने जमीदारों एवं साहूकारों के द्वारा हमारा शोषण किया। हमारे शोषण का सिलसिला बदस्तूर चला आ रहा है ।

समय के साथ निजाम बदलते गए लेकिन हमारे शोषण का सिलसिला कभी रुका नहीं और हमें इस बात की उम्मीद भी नहीं है कि भविष्य में कभी रुकेगा। आजादी के बाद हम सब में कुछ उम्मीद जगी थी कि शायद अब हमारी शोषण का सिलसिला थमें । हमारे जीवन में भी आजादी का सूरज एक नया सवेरा लेकर आए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पहले भी हम दीन- हीन थे दूसरों पर आश्रित थे आज भी हम दूसरों पर आश्रित हैं।

हमारा काम जी -तोड़ मेहनत कर अपने खून- पसीने से अन्न उगाना है ,लेकिन वह किस भाव बिकेगा, हमारी लागत आएगी या नहीं ,यह हमसे कोई नहीं पूछता। हमारे अनाज का दाम सरकार तय करती है। वे लोग हमारे अनाज का दाम तय करते हैं जो वातानुकूलित सरकारी दफ्तर में बैठते हैं ,जिसने कभी किसान का दर्द नजदीक से देखा ही नहीं। उन्हें हमारी पीड़ा का आभास क्या होगा, उनके जी में जो आया वह हमारी अनाज का मूल्य तय कर देते हैं। हमें तो सरकार द्वारा बस फरमान सुनाया जाता है – इतने रुपए किलो चावल, इतने रुपए किलो गेहूँ और दाल इतने रुपए किलो। हम अपने अरमानों का गला घोट कर मुंह पर ताला लगाकर औने -पौने दाम में अपना अनाज बेच देते हैं।

अनाज मंडी में जब हम अपना अनाज बेच जाते हैं तो वहां पर अढ़तिया हमारा शोषण करता है। वह कहता है इतने में बेचना है तो बताओ नहीं तो अपना अनाज उठाकर चलते बनो। हम मन मसोसकर अपने भाग्य का दोष मानकर अनाज बेच देते हैं। जब घर आते हैं तो साहूकार या कर्जदार दरवाजे पर पहले सेे ही खड़ा मिलता है ।जितना रुपया हमको दिया रहता है ब्याज सहित सब एक- एक पाई वसूल लेता है। अब हमारे पास बचता क्या है ,जो बचता है उसी में हम संतोष कर लेते हैं। हमने क्या-क्या अरमान पाल रखा था। इस बार अनाज बेचकर बेटी की शादी करेंगे ,बीवी -बच्चों को नया कपड़ा बनवा देेंगे और अपने लिए एक जोड़ा धोती -बनियान खरीदेंगे। अपने सोचने से थोडें कुछ होता है ,जब किस्मत में ही नहीं तो कहां से इतनी आमदनी हो कि हमारी सारी मुराद पूरी हो जाए। इसे हम देव संयोग एवं अपनी किस्मत का खेल मान कर फिर खेती- किसानी में लग जाते हैं। चलो अगले बरस सब कुछ खरीदेंगे, बेटी की शादी भी टल जाती है, क्योंकि आज के दौर में शादी करने के लिए रुपए- पैसे चाहिए,बिन रुपए पैसे के हमारी बेटी से शादी करेगा कौन? इसी तरह साल -दर -साल हमारी सारी योजनाएं टलती जाती हैं।

एक दिन ऐसा आता है जब बेटी शादी की बाट जोहते -जोहते आत्महत्या कर लेती है। हम बेटी का दर्द सीने में दबाए हुए फिर खेती- किसानी में लग जाते हैं। सुना है हमें अन्नदाता और धरतीपुत्र जैसे जाने कई नामों से संबोधित किया जाता है ,लेकिन हम तो अपनी नजरों में धरती के बोझ और अनाज के दुश्मन हैं। आखिर करते -धरते कुछ नहीं बस उम्मीदें पाले रहते हैं ,शायद आगे हमारी स्थिति सुधर जाए। सच्चाई तो यह है जो कभी सुधरने वाली ही नहीं ।हमारा हाल कोई जानने वाला ही नहीं ,हम किससे अपना दर्द कहें ,कौन हमारे दर्द पर मरहम लगाएगा? हमारा तो दर्द नासूर जैसा है जो कभी ठीक होने वाला ही नहीं । सुना है इस बार सरकार किसानों के हित में एक नया कानून बनाने वाली है, जिसमें हमारा भला होगा ,हमारे अनाज का उचित दाम मिलेगा, हमारी फसलों को गल्ला मंडी के अढ़तिये नहीं बल्कि पूंजीपति खरीदेंगे। अभी तो हम लोग अढ़तिये से अपने कुछ बात कह भी लेते थे ,लेकिन
अब पूजीपतियों के सामने तो हमारी घिग्गी ही बंध जाएगी। हम चूँ भी नहीं कर सकते। सरकार कह रही है हमने किसानों के हित में फैसला लिया है और बहुत से हमारे किसान संगठन और विरोधी दल वाले लोग कह रहे हैं कि इससे किसानों की दशा पहले से भी ज्यादा खराब होगी। हम किसकी मानें सरकार की या किसान संगठनों की या विरोधी दलों की, हमारे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। चलो राम भरोसे होकर हम फिर चुप्पी साध लेते हैं,जो होगा देखा जाएगा। यदि सरकार की मंशा हमें जीवनदान देने की होगी तो अच्छा ही है, वरना हमें आत्महत्या करने से कौन रोक सकता है। हमारे साथी किसान साल -दर -साल आत्महत्या करते हैं ,कभी फसल के खराब होने पर ,कभी कर्ज न भर पाने के कारण ,तो कभी घर की जरूरतें पूरा न होने कारण। लगता है हमारे बलिदान देने का सिलसिला कभी थमेंगा ही नहीं। कहने के लिए हम लोकतांत्रिक देश में जी रहे हैं ,जहां हर पाँच साल पर चुनाव होता है, सरकार बदलती है,पुरानी सरकार जाती हैऔर नई सरकार आती है। हमारे हित में कोई नहीं सोचता ।

हम झूठी उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं कि सायद इस बार हमारी समस्या का कोई स्थाई हल निकल आए , लेकिन होता वही ढाक के तीन पात। बस इतनी सी थी मेरी पीड़ा ,आगे कभी मौका मिला तो जरूर अपना दर्द आप लोगों से बांटूगा, तब तक के लिए जय राम जी की।

Trending News