संवाददाता प्रताप सिंह आज़ाद
आगरा। भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है, लेकिन सामाजिक संरचना की ऐतिहासिक असमानताओं के कारण यह आदर्श लंबे समय तक व्यवहारिक रूप में पूर्ण रूप से साकार नहीं हो सका। जाति आधारित असमानता, सामाजिक बहिष्कार और संसाधनों के असमान वितरण ने लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति को सीमित किया है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय केवल एक नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता और स्थिरता का केंद्रीय प्रश्न बन जाता है।
इसी संदर्भ में बहुजन आंदोलन के महानायक मान्यवर कांशीराम का उदय भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जाता है। उन्होंने सामाजिक न्याय के प्रश्न को केवल सामाजिक सुधार तक सीमित न रखकर उसे राजनीतिक सत्ता में भागीदारी से जोड़ दिया। उनका स्पष्ट मानना था कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के बहुसंख्यक लेकिन वंचित वर्ग सत्ता संरचनाओं में वास्तविक प्रतिनिधित्व प्राप्त करेंगे।

कांशीराम के वैचारिक विकास पर भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताओं का गहरा प्रभाव था। उन्होंने महसूस किया कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के बावजूद सामाजिक परिवर्तन की गति बहुत धीमी है। इसीलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सामाजिक परिवर्तन के लिए राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना आवश्यक है। इस विचारधारा पर डॉ भीमराव आंबेडकर के विचारों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
कांशीराम ने “बहुजन” की अवधारणा को राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों को शामिल किया गया। उनका प्रसिद्ध नारा “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बहस को नई दिशा देता है।
बहुजन चेतना को संगठित करने के लिए उन्होंने 1970 के दशक में BAMCEF की स्थापना की, जिसका उद्देश्य शिक्षित वर्ग को सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करना था। इसके बाद 1981 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS4) का गठन किया गया, जिसने बहुजन समाज में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का काम किया।
आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण चरण 1984 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना के साथ शुरू हुआ। यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि बहुजन आंदोलन का संस्थागत रूप था। कांशीराम ने चुनावी राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनाया और यह सिद्ध किया कि संगठित मतदाता समूह लोकतांत्रिक सत्ता की दिशा बदल सकता है।
कांशीराम की परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू नेतृत्व निर्माण भी था। इसी संदर्भ में मायावती का राजनीतिक उदय बहुजन आंदोलन की वैचारिक सफलता का प्रतीक बना। उनका उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनना सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
हालाँकि कांशीराम की राजनीति को लेकर आलोचनाएँ भी हुईं। कुछ लोगों का मानना था कि पहचान आधारित राजनीति सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती है। लेकिन बहुजन विचारकों का तर्क है कि जब तक समाज में जातिगत असमानता मौजूद है, तब तक उसके विरुद्ध राजनीतिक संगठन आवश्यक है।
समकालीन समय में भी सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और समान अवसर के प्रश्न लगातार सामने आते रहते हैं। ऐसे में कांशीराम की यह अवधारणा कि “सामाजिक परिवर्तन के लिए राजनीतिक शक्ति आवश्यक है” आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है।
डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार बहुजन आंदोलन ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह आंदोलन केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक भागीदारी की निरंतर खोज भी है।
लेखक
डॉ प्रमोद कुमार
डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov
डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा