Etawah News: Benipura team won in quarter final of Panchnad Cricket Championship
संवाददाता : दिलीप कुमार
चकरनगर : चंबल विद्यापीठ परिवार द्वारा आयोजित ‘पंचनद क्रिकेट चैंपियनशिप’ के नौवें दिन बेनीपुरा और कर्तलापुर टीमों के बीच क्वार्टर फाइनल मुकाबला हुआ। बेनीपुरा टीम ने टाॅस जीतकर बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 12 ओवर में 6 विकेट के नुकसान से 125 रन बनाए। बेनीपुरा टीम के खिलाडी़ सनी ने 4 छक्के और 9 चौके लगाने के साथ 76 रन बनाये। बेनीपुरा टीम के कप्तान यशवंत ने 23 रन बनाये। अक्षय और अवनीश ने 2-2 विकेट झटके। हिम्मतपुर ग्राउंड पर तेज हवा से बार-बार धूल की चादर छा जाती।
जवाब में उतरी कर्तलापुर टीम लक्ष्य का पीछा करते हुए 9 विकेट के नुकसान से 119 रन बनाकर हार गयी। आखिरी लम्हे तक मैच दिलचस्प बना रहा। कर्तलापुर टीम के खिलाड़ी आलम अली और गोलू ने 34-34 रन बनाए। मानवेंद्र ने 3 विकेट और मोईन ने 2 विकेट झटके। बेनीपुरा टीम के खिलाड़ी सनी मैन आफ द मैच रहे। उन्हें सुनील निषाद और राघवेंद्र पांडेय के हाथों ट्राफी प्रदान की गयी।
पांच नदियों के महासंगम के नजदीक यह चैंपियनशिप 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में हो रही है। जिसमें जालौन, औरैया, इटावा और भिंड के खिलाडियों ने हिस्सा लिया है। इस दौरान चंबल अंचल के महान क्रांतियोद्धा अमर शहीद पांडरी वाले बाबा को नमन किया गया। चंबल विद्यापीठ के संस्थापक लेखक डॉ. शाह आलम राना ने अमर क्रांतिकारी रूपचंद पाण्डेय का उल्लेख करते हुए बताया कि वे ग्राम बझाई परगना व जिला भिंड के निवासी थे। क्वारी नदी के किनारे बसे इस गांव के दूसरी तरफ इटावा जिले के चकरनगर इलाके का भूभाग है। 1857 की क्रान्ति के लिए निर्धारित तिथि 31 मई 1857 को चकरनगर के युवा क्रान्तिकारी नेता निरंजन सिंह चौहान और भरेह के क्रान्तिकारी नेता रूप सिंह सेंगर ने अपने क्षेत्रों में स्वतंत्रता की घोषणायें कर दी थी।
ग्वालियर रियासत के सूबा भिंड के क्रान्तिकारी नेता दौलत सिंह ने दिनांक 3 मई 1857 को दबोह (भिंड) पर कब्जा करके स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। रूपचंद पांडेय क्रांति प्रारंम्भ होते ही सक्रिय हो गए थे, उन्होंने अपने गांव, क्वारी नदी के किनारे के अन्य गांवों-नदोरी, कनावर आदि के वीरों को जागृत, संगठित और सशस्त्र कर उनका मारकदस्ता तैयार करने के साथ अपने क्रांतिकारी साथियों से मिलकर अपने गांव के 50 मील के घेरे में अंग्रेजी सेनाओं और ब्रिटिशराज के समर्थक देशी राजाओं तथा समंतो के सैन्यबल के खिलाफ अनेकों युद्ध लड़े थे। क्रान्ति की राष्ट्रीय नायिका झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और उनके सहयोद्धाओं के 26 मई 1858 को गोपालपुरा आने पर रूपचंद अपने मारक क्रान्तिकारी सैन्य दस्ते के साथ उनसे जा मिले थे, ग्वालियर पर अधिकार कर उसे क्रान्ति का नया केन्द्र बनाने रानी लक्ष्मीबाई के सैन्य अभियान में वे सम्मिलित रहे थे। रूपचंद पांडेय की भांति चंबल अंचल के सहस्त्रों युवक जनमुक्त सेना में अपने प्राणों को उत्सर्ग करने की भावना से भर्ती हुए थे। फिरंगी सरकार का नामोनिशान मिटा देने की भावना से रूपचंद पांडेय क्रान्तिकारी नेताओं के प्रिय बन गए थे।
ग्वालियर युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई का साथ देते हुए रूपचंद पांडेय का पैर कट गया। किसी तरह उनके क्रांतिकारी साथी उनको ग्वालियर से बीहड़ लाये। उन दिनों इलाज की अच्छी व्यवस्था भी नहीं थी। अंग्रेजी फौजें और सिन्धिया की सेना क्षेत्र में कहर ढा रही थी। वीर रूपचंद पांडेय को उनके गांव से पूरब क्वारी नदी किनारे घने बीहड़ में गुप्त रूप से रखकर उपलब्ध साधनों से उनके इलाज की व्यवस्था की गई, उस गुप्त स्थान से पांडरी गांव समीप था। कुछ समय इलाज के बावजूद वीर रूपचन्द पाण्डेय ने अपने कुछ विश्वसनीय क्रान्तिकारी वीरों की उपस्थिति में क्रान्ति की विजय में अटूट आस्था के साथ अपनी अंतिम सांस ली। साथियों ने नदी के किनारे उसी स्थान पर शहीद का दाह संस्कार किया और उसी स्थान पर उनकी स्मृति चिन्ह बना दिया। जिसने बाद में “पांडरी वाले बाबा” के नाम से प्रसिद्धी पाई।

