संवाददाता मोहन सिंह बेतिया
बिहार राज्य किसान सभा के संयुक्त सचिव प्रभुराज नारायण राव ने कहा कि अखिल भारतीय किसान सभा ने केंद्र सरकार से मांग की है कि जलवायु में हो रहे लगातार परिवर्तन के कारण गेहूं सहित सभी रबी फसलों के उत्पादन में भारी कमी हुई है । साथ हीं फसलों के लागत में बेतहाशा वृद्धि को देखते हुए गेहूं की खरीद के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 500 रुपये प्रति क्विंटल पर बोनस दिया जाए। किसान सभा ने कहा कि सरकारी एजेंसियों द्वारा पर्याप्त संख्या में गेहूं की खरीद केंद्र नहीं खोली गई है , जिसके चलते किसानों को उत्पादन में आई कमी और सरकारी स्तर पर कम खरीद की दोहरी मार का सामना किसानों को करना पड़ रहा है। जिसके कारण किसानों के सामने आई संकट से मजबूर होकर व्यपारियो की शर्तो पर बिक्री करना पड़ रहा है । जिस के परिणामस्वरूप गहूं कि अपार मांग और कम उपलब्धता के बावजूद भी किसानो की कमाई में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।
किसान सभा ने यह भी कहा है कि इस बोनस का लाभ उन किसानों को भी दिया जाना चाहिए जो पहले ही अपना गेहूं सरकारी एजेंसियों या बिचौलियों को बेच चुके हैं।
बेमौसम आई गर्मी के हिसाब से फसल का पटवन पर्याप्त नहीं हुआ है और यूरिया खाद की चोरबाजारी भी इसका कारण है । इस वर्ष उत्पादन के 20-25% की फसल की बर्बादी के कारण किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। इसके बाद भी मोदी सरकार ने इस साल 44.4 करोड़ टन गेहूं के घोषित कोटे का आधा की भी खनहीं खरीदारी नहीं हुई है ।
यदि सरकारी एजेंसियां गेहूं की लक्षित मात्रा की खरीद के लिए आगे नहीं आती हैं, तो निकट भविष्य में खाद्य सुरक्षा और आटे व अन्य खाद्यान्नों की कीमतों में भारी वृद्धि का खतरा है।
स्थिति का फायदा उठाकर निजी व्यापारी और कॉरपोरेट कंपनियां जमाखोरी व मुनाफाखोरी के लिए भारी मात्रा में गेहूं की खरीद में जुटी हुई है। तो दूसरी ओर व्यापारी आटे की कीमतों में भारी वृद्धि कर रहे हैं और इस तरह कालाबाजारी के माध्यम से भारी मुनाफाखोरी करने की जुगत लगे हुए हैं । इसमें सरकार की भी सहयोग उसे प्राप्त है । यहीं कारण है कि केंद्र सरकार सरकारी एजेंसियों को पीछे हटा कर कृषि बाजार पर निजी व्यापारियों और कॉर्पोरेट कंपनियों को बैठाने का भरपूर कोशिश कर रही है ।
इस प्रकार कृषि का कॉर्पोरेटीकरण करने में मोदी सरकार लग गई है और उनको सुविधा देने की पूरी कोशिश कर रही है।
मोदी सरकार के इजाजत से गेहूं के निर्यात को बढ़ावा दिया गया । जो 2020-21 में गेहूं का निर्यात 21.55 लाख टन था । जबकि 2021-22 में इसे बढ़ाकर 72.15 लाख टन हो गया है। इस नीति ने घरेलू खाद्य भंडार को प्रभावित किया है और गेहूं के स्टॉक की कमी के कारण मोदी सरकार को उन क्षेत्रों में चावल वितरित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है जहां पहले गेहूं वितरित किया जाता था। इससे किसानों के बीच व्यापक फसल बिक्री का संकट पैदा हो गया है तथा देश में लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा ख़त्म होने का खतरा भी पैदा हो गया है ।
ठीक इसी समय में बिहार जैसे राज्य में अनाज से पैदा होने वाले इथनॉल प्लांट लगा कर भुखमरी का संकट पैदा कर रही है । जबकि बिहार के 18 बन्द चीनी मिलों सरकार चालू कर देती तो गन्ना की खेती का विस्तार होता । इस नगदी फसल से किसानों को लाभ मिलता । तो दूसरी तरफ मिलों में चीनी बनने के बाद उसके बायो प्रोडक्ट के रूप में इथनॉल , बिजली , खाद , स्पिरिट , कागज जैसे अनेक लाभकारी उत्पादन होते ।
बिहार राज्य किसान सभा मोदी सरकार और नीतीश सरकार की इन किसान विरोधी नीतियों का कड़ा विरोध करता है।