संवाददाता: राजेन्द्र कुमार
स्थान: दयालपुर, वैशाली (बिहार)
दयालपुर । महाकवि कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञानशाकुंतलम् भारतीय साहित्य की एक अनुपम कृति है, जो केवल प्रेम कहानी ही नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन के उच्च आदर्शों को भी प्रस्तुत करती है।
इस नाटक में दुष्यंत और शकुंतला का प्रेम विवाह, दुर्वासा ऋषि के श्राप के बाद भी अटूट बना रहता है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद यह संबंध अंततः पुनर्मिलन के साथ समाज के सामने आदर्श स्थापित करता है।
शादी के बाद राजा दुष्यंत गर्भवती शकुंतला को पहचानने से इनकार कर देते हैं, लेकिन शकुंतला धैर्य और सहनशीलता का परिचय देती हैं। वह क्रोधित होकर कोई विनाशकारी कदम नहीं उठातीं, बल्कि उचित समय की प्रतीक्षा करती हैं।
जब दुर्वासा ऋषि का श्राप समाप्त होता है, तब दुष्यंत को अपनी भूल का एहसास होता है और वह शकुंतला व अपने पुत्र को पुनः स्वीकार करते हैं।
आज के संदर्भ में यह कथा अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि वर्तमान समाज में तलाक और पारिवारिक विवादों की संख्या बढ़ती जा रही है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों का टूटना चिंता का विषय बन गया है।
नाटक में ऋषि कण्व द्वारा शकुंतला को दी गई शिक्षा आज भी हर नवविवाहित जोड़े के लिए मार्गदर्शक है—
- बड़ों का सम्मान करें
- छोटे को स्नेह दें
- पति को ताना न दें
- मायके की तुलना ससुराल से न करें
- अभिमान से दूर रहें
यह शिक्षाएं आज भी सफल वैवाहिक जीवन की कुंजी हैं।
इस प्रकार अभिज्ञानशाकुंतलम् केवल एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज और वैवाहिक संस्था को मजबूत बनाने वाली प्रेरणादायक कृति है।