लेखन – जय मोहन (प्रयागराज)
कॅरोना कॅरोना कॅरोना का भय चारो ओर व्याप्त है।लॉक डाउन चल रहा है।सभी अपने घरों में दुबके है।सरकारी मातहत बचाव कार्य मे जुटे हैं।आम लोग तो घरों में कैद हो गये पर डॉक्टर,पुलिस, उच्च अधिकारियों की भाग दौड़ तेज़ हो गयी ।महा संग्राम सी स्तिथि थी।ये लोग कर्मवीर योद्धा थे जो लोगो को इस महामारी राक्षस के मुँह से बचा कर अपनी जान की परवाह न कर बचा रहे थे।लोगो मे दहशत इस बात की थी कि यदि कुछ बुरा हुआ तो अंत समय मे चाह कर भी अपनो से नही मिल पायेंगे।हसरते दिल मे दफन हो जायेंगी।रवि जिलाधिकारी था रात दिन शासन के निर्देशों का पालन कर,व करवा रहा था।कल रात सोते सोते हल्की सिहरन सी हो रही थी।डर ने फन काढ़ा कही मुझे भी तो नही डस लिया इस कॅरोना ने। चेकअप कराया तो कॅरोना पुष्टित हुआ।छोटा जिला वहाँ का बड़ा अधिकारी तहलका मचा गया साहब को कॅरोना हो गया।चौदह दिन अस्पताल में बिताना वो भी नितांत एकांत मेंचौदह बरस जैसे कटे ।

आज स्वस्थ हो कर अस्प्ताल से बाहर निकला तो ऑफिस के लोग अखबार वाले फूल माला लेकर खड़े थे।घर पहुँचा तो बीबी बच्चे वेलकम टू होम कर रहे थे।बच्चो ने बूके दिया बीबी ने टीका कर आरती उतारी पर रवि की नज़र किसी और को तलाश रही थी।वह सीधे माँ के कमरे में गया ।देखा माँ आँचल पसारे कह रही थी माँ तुझे कसम है एक बेटी की उसका आँचल सूना न करना मेरे रवि को लम्बी उम्र देना स्वयं बड़बड़ा रही थी उसकी जगह मुझे बुला लेना।रवि रुक न सका उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी।माँ माँ मैं आ गया तेरा रवि ठीक हो कर आ गया माँ से वह छोटे बच्चे की तरह लिपट गया ।माँ को कुर्सी पर बैठा कर उसकी गोद मे सर छुपा कहने लगा माफ कर दे मुझे माँ।मैं उन चौदह दिनों की एकांत की भयावह पीड़ा नही भूल पाऊँगा।मैं कैसे भूल गया तुझे ।चौदह दिनों में किसी से न मिलना न बोलना समय से रोबोट की तरह की दिनचर्या ने मुझे झकझोर दिया।मुझे याद आया कि तुझे अकेलेपन से डर लगता है चुप रहना बीमार सा लगता है।याद है मुझे वो दिन जब दादी ने मेरी शैतानी पर मुझे दिन भर अकेला रहने की सज़ा दी तो कभी न बोलने वाली मेरी माँ की आवाज़ मुखरित हुई ।पहली बार आपने दादी के सामने मुँह खोला माँ जी बच्चा है अकेले में घबरा जाएगा।बस इतनी सी बात पर हंगामा बरपा था।दादी ने पापा से न जाने क्या कहा कि वो बरस पड़े आप पर पता नही क्यो पापा को हम दोनों नही भाते थे शायद उन्हें आपके गरीब परिवार से आने व दहेज़ न लाने का दंश हमेशा रहता था।तू कितनी शांत थी माँ बेटे की बाते फटकार बिना कसूर सुनती थी।बाद में समझ आया मेरे लिए सहती थी। पापा के स्वर्गवास के बाद चाचा ने हमे घर से बेघर कर दिया तू कितना रोई गिड़गिड़ाई पर दादी को भी दया नही आयीं।मुझे पालने को हर दुख सहे मेहनत कर मुझे पढ़ाया आज मैं तेरी ही तपस्या से इस ओहदे तक पहुँचा। माँ मैं तुझे कैसे भूल गया। मेरी शादी बड़े घर मे हुई तूने रीना को भरपूर प्यार देना चाहा पर उसे तेरी नही मेरी दरकार थी।तू तो आना भी नही चाहती थी पर मेरा कहना टाल न सकी।यहाँ रीना को तुझसे नफरत थी।ऊंची सोसायटी में अनपढ़ सास को बताना शर्म की बात थी। मैं पक्ष लेता तो कलह होती तू फिर मेरे कारण सहने को मजबूर हो गयी।मेरी ममता ने तेरे पांव जकड़ लिया।रीना से कहता माँ को भी साथ खाने को बुला लिया करो।वो कहती अरे क्या कमी है कमरा,नोकर, टी वी ,समय पर खाना सब कुछ तो मिल जाता है उन्हें।एक दिन रीना ने तेरे लिया ज्यादा बोला तो मेरा हाथ उठ गया।तब भी आँसू पीते हुते तुमने मुझे समझाया बेटा तू देर सबेर आता है मेरी उम्र हो रही है मैं जल्दी खा लेती हूँ सही तो कह रही है बहू सारी सुविधा तो है मेरे पास।बच्चे भी अंग्रेजी न जानने वाली दादी न बात करते न दोस्तो से मिलवाते।कैसे भूल गया तुमसे अकेले नही खाया जाता।काम मे इतना व्यस्त हो गया।इन चौदह दिनों में जो मानसिक पीड़ा मिली वह असहनीय है। कमरे में टी वी, किताबे ,खाना, दवाएं पर किसी का न मिलना अवसाद में ले जा रहा था।नींद भी नही आती बुरे बुरे विचार दिमाग मे आते। तू कैसे सही चुपचाप इतने दिन माँ तू कहती थी न कि भगवान जो करता है अच्छा करता है। मुझे भी कॅरोना किया कि मुझे तेरी पीड़ा का अहसास हो, अकेले पन का कष्ट समझ आये।अब मैं कभी तुझे अकेला नही छोडूंगा।यदि बीबी बच्चे मेरी बात न माने तो इन्हें छोड़ दूगां नॉकरी छोड़ दूगां। हम अपने गांव लौट चलेंगे। माँ मुझे तेरा साथ चाहिए। बोल न माँ तू सुन रही है न। सर उठा रवि ने देखा माँ एकटक प्रभु का विग्रह निहार रही है ।चलो माँ इस कमरे से।हिलाने पर वो लुढ़क गयी।बेटे को बचाने के लिए स्वयं के जीवनदान देने की सच्चे मन की विनती विधाता ने सुन ली ।माँ रवि चीख पड़ा माँ वो चौदह दिन का एकांत तो कट गया पर तू मुझे ज़िन्दगी भर को क्वारन्टीन कर तन्हा कर गयी।