संवाददाता : राजेन्द्र कुमार
राजापाकर, वैशाली।
राजापाकर स्थित कबीर मठ आश्रम परिसर में सद्गुरु संत कबीर प्राकट्य दिवस श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए कबीरपंथी साधु-संत, महात्मा एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर कबीर मठ आश्रम के महंत ज्ञान प्रकाश शास्त्री ने किया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में महंत ज्ञान प्रकाश शास्त्री ने कहा कि संत कबीरदास हिंदी साहित्य के महान संत, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि थे। उन्होंने अपने दोहों और साखियों के माध्यम से प्रेम, सत्य, समानता और ईश्वर भक्ति का संदेश दिया। उन्होंने जाति-पांति, ऊंच-नीच, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए मानवता और सद्भाव का मार्ग दिखाया।
उन्होंने बताया कि संत कबीर का जन्म लगभग वर्ष 1398 ईस्वी में वाराणसी के लहरतारा क्षेत्र में माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा ने किया। कबीर ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन सत्संग और जीवन अनुभवों से गहन ज्ञान अर्जित किया। उनके गुरु स्वामी रामानंद माने जाते हैं, जिनसे उन्हें भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की प्रेरणा मिली।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे शिक्षाविद रविंद्र प्रसाद सिंह एवं नगीना प्रसाद सिंह ने कहा कि संत कबीर की रचनाएँ दोहा, साखी, सबद और रमैनी के रूप में उपलब्ध हैं, जिनका प्रमुख संकलन ‘बीजक’ है। उन्होंने कहा कि कबीर ने ईश्वर की एकता, मानव सेवा, सच्ची भक्ति और सदाचार का संदेश दिया तथा सामाजिक भेदभाव और धार्मिक आडंबर का विरोध किया। उन्होंने कबीर का प्रसिद्ध दोहा— “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय; जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय” —का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आज भी समाज को आत्मचिंतन और सद्भाव का संदेश देता है।
इस अवसर पर प्रसिद्ध व्यास मजे लाल राय ने कबीर साहब के दोहों, भजनों, प्रवचनों एवं भक्ति गीतों की प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रद्धालुओं को उनके उच्च विचारों से अवगत कराया। वहीं डॉ. गौरीशंकर कुमार द्वारा निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन कर लोगों की स्वास्थ्य जांच एवं परामर्श दिया गया।
कार्यक्रम में नगीना प्रसाद सिंह, रविंद्र प्रसाद सिंह, अनिल कुमार, हरिशंकर गोसाईं, प्रमोद कुमार, मजे लाल राय, रामबालक दास, हरेंद्र गोसाईं, प्रो. रघुवंश राय, दिनेश प्रसाद राय, राम इकबाल गोसाईं, मंटू गोसाईं, जगदीश गोसाईं सहित जिले के विभिन्न मठों के महंत, संत-महात्मा एवं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम (गुवाहाटी) और नेपाल से आए कबीरपंथी संतों ने भाग लिया।