डॉ धर्मेन्द्र कुमार
जसवंत नगर, इटावा (उत्तर प्रदेश)
चोर चोर मौसाइते वाली कहावत सदियों से फिजा में गूंज रही है, यह उक्ति कटु सत्य है, किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह वाक्य किसी ग्रंथ में लिखित स्थान नहीं पा सका। और यह भी सत्य है कोई इसे लोगों की जुबान से मिटा भी नहीं सका।
शिक्षा के निजीकरण पर लूट कांड अमर बेल की तरह फैल रहा है किंतु इसे पुष्पित और पल्लवित होना नहीं कहा जा सकता क्योंकि अमर वेल के हिस्से में पुष्पित होना नहीं है सिर्फ पल्लवित होना ही उसका सौभाग्य है। जैसे भ्रष्टाचार, दुराचार, चोरी, डकैती, लूट, बलात्कार को कभी सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती है किंतु यह सब बुराइयां समाज का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं।
आजकल निजीकरण का सबसे ज्यादा खामियाजा शिक्षा के नाम पर समाज के आम आदमी को झेलना पड़ रहा है सत्ता पक्ष के साथ संपूर्ण विपक्ष भी इस भ्रष्टाचार में हाथ से हाथ मिलाकर पूरी तरह सहयोग कर रहा है, ना कि विरोध। इस मसले पर लगता है सरकार और विपक्ष भ्रष्टाचार की एक ही थाली में बैठकर साथ-साथ खा रहे हैं।
आज प्राथमिक स्तर से लेकर 12वीं कक्षा तक चल रहे निजी शिक्षण संस्थान अच्छी शिक्षा और गुणवत्ता के नाम पर लूट के अड्डे बने हुए हैं। जो अलग-अलग निजी शिक्षा बोर्ड से संचालित हैं लोगों में एक ट्रेंड बन गया है, कि हम अपने पुत्र /पुत्री को चमकदार सीसा वाले स्कूल में , आवागमन हेतु बस वाले स्कूल में, सप्ताह में 3 से 6 बार ड्रेस कोड चेंज करने वाले स्कूल में, बच्चों को टाई लगाने वाले स्कूल में भेजेंगे। जहां सरकारी स्कूल वाले गुरुजी का बच्चा पड़ता है। क्योंकि सरकारी स्कूल वाले गुरुजी वेतन तो सरकारी लेंगे किंतु अपने बच्चों को पड़ने भेजेंगे निजी स्कूल में और उनका लड़का बड़ा होकर सरकारी स्कूल का अध्यापक बनाने के लिए प्रयासरत रहेंगे। यही असली कारण और सच्चाई है कि सभी निजी संस्थान के मालिक लगातार मालामाल होते चले जा रहे हैं।
अब बात करें इन निजी संस्थाओं की गतिविधियों पर जिसमें ऐसा पाठ्यक्रम प्रयोग किया जाता है जिसमें किताबें रंगनी पड़ती हैं इसका मतलब किसी भी छात्र/छात्रा का छोटा भाई/ बहन इस पाठ्यक्रम की पुस्तकों का लाभ नहीं ले सकता। जिसमें प्लेवे,नर्सरी 1, नर्सरी 2, उसके बाद कक्षा एक आएगा उसमें इन छोटी-छोटी कक्षाओं की पुस्तक कॉपियां,बैग दो-तीन ड्रेस, सब मिला कर इन कक्षाओं की पाठ्य सामग्री लगभग सब जोड़कर 8 से 10,000/₹ की। जिसे संरक्षक खरीदने पर विवश होता है।
वहीं अगली कक्षा में हजारों का पाठ्यक्रम खरीदना छात्र/छात्रा के मां-बाप की मजबूरी है। और फिर ₹500/ से ₹1000/, ₹2000/ की प्रतिमाह फीस का भुगतान संरक्षक मन मसोस -मसोस भरता है। ऊपर से परीक्षा के नाम पर ₹100/, ₹, 200/, ₹ 500/या ₹1000/ जो भी निश्चित हो तीन बार अलग-अलग वसूली जाएगी।
इस अवैध व्यापार में स्कूल संचालक पूरी तरह लिप्त होता है। और छोटा सा स्कूल प्रतिवर्ष लाखों रुपया कमाने लगता है। किंतु विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक/ शिक्षिकाएं प्रतिमाह ₹3000 / से ₹5000 प्रति माह वेतन पर अपना शोषण कराने पर विवश होते हैं। हाँ कहीं सैंकड़ो में एकाध अध्यापक 10,15 या 20,000/वेतन पा लेता है।
निजी स्कूल पाठ्यक्रम के नाम पर कोई ब्रांडेड पाठ्यक्रम जैसे यूपी बोर्ड, एमपी बोर्ड या अन्य किसी राज्य के बोर्ड की किताबें अथवा एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम को न लगाकर सीधा 60 से 70% कमीशन वाला प्राइवेट पाठ्यक्रम लगाकर आम आदमी को बेहतर शिक्षा के नाम पर खुली डकैती लूट का शिकार बनाया जाता है। और यह भ्रष्टाचार चरम सीमा पर हो रहा है। इस मामले में सरकार चुप ही रहती है मानो इसके सोचने समझने की शक्ति पर किसी ने बलात कब्जा कर लिया हो।
वहीं विपक्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बजाय, भ्रष्टाचार की मलाई को पेट भर भर के खाकर, लूट की गंगा में पूरा शरीर डुबो डुबोकर नहा रहे होते हैं।
शिक्षा की इस बेहाल व्यवस्था में विपक्ष उतना ही सहयोगी है।
जितना किसी डकैती में मुखबिरी करने वाला होता है, और उसका हिस्सा डकैतों द्वारा पूर्व नियत होता है।क्योंकि सत्ता समर्थित स्कूल संचालक के अलावा विपक्ष के स्कूल भी भ्रष्टाचार की गंगोत्री को पवित्र बताकर, आम आदमी को झूठे प्रचार प्रसार के माध्यम से लोगों को अपने जाल में फसाते हैं।
अब असल मुद्दा भ्रष्टाचार का नहीं रहा है,बल्कि विपक्ष का शिक्षा पर अगली पिछली सरकारों को लगातार समर्थन जारी रहेगा। सिर्फ इस नीति पर कि तुम भी लूटो हमें भी लूटने दो
अर्थात सत्ता पक्ष और विपक्ष शिक्षा पर लूट में चोर -चोर मौसाइते हैं। जनता का क्या? बस चुनाव के समय कुछ मनगढ़ंत मुद्दे लाकर जनता से वोट ले ही लिया जाएगा क्योंकि जनता वोट का करेगी भी क्या?