सुनील पांडेय : कार्यकारी संपादक
जिंदगी तबाह हो रही है और हम मुस्कुराए जा रहे हैं। मौत हमारे सर पर खड़ी है लेकिन हम फिर भी पीछे नहीं हट रहे हैं ,क्या यही जिंदगी है ?दुकानें खुल गई हैं, बाजार आबाद हो गए हैं ,लेकिन जिंदगियां तबाह हो रही हैं। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता जो जिंदा है वह मौत की तलाश में देखो बेखौफ सड़क पर निकल रहे हैं उन्होंने मास्क पहनना रखा है तो ऐसे लग रहा है जैसे कवच मिल गया हो। दिन प्रतिदिन हम

एक-एक देशों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं कभी हम 10 पर थे आज 6 पर पहुंच गए हैं। अभी और कितना आगे जाएंगे कुछ कहा नहीं जा सकता । बस ऐसे ही चलता रहा तो 1 दिन हम अमेरिका को भी पीछे छोड़ देंगे। हम इस बात पर खुश हैं कि दुकानें खुल गई हैं सरकारी और गैर सरकारी प्रतिष्ठान खुल गए हैं। अर्थव्यवस्था को गति मिल रही है ,देश आगे बढ़ रहा है, लेकिन मौत हमारी पीछे आ रही है। हमें तो जैसे किसी बात का गम ही नहीं ,जो लोग मर रहे हैं वह मेरी अपने थोडे़ ही है अभी मैं तो सुरक्षित हूं मुझे किस बात का गम है। जो मर रहा है उसके परिवार वाले समझे मेरा परिवार तो अभी सुरक्षित है। मैंने देश के लोगों का ठेका थोड़ी ले रखा है ,जो करेगा वह भरेगा, जो डरेगा वह बचेगा, जो बेखौफ घूमेगा उसका हश्र तो आपके सामने है। बात बहुत छोटी सी है अभी भी संभल जाइए ,अभी बहुत कुछ नहीं गया, अभी भी मौका है ,खुद को समझने का। जिंदगी को यूं ही न तबाह करिए साहेब क्योंकि यह एक बार बड़ी मिन्नतों से मिलती है उसी ऐतिहात के साथ जिएँ नहीं तो कब्र और श्मशान आपका इंतजार कर रहे हैं। जिंदगी भर खुशी के पीछे भागने वाले अगर आप भी न संभले तो अंतिम संस्कार भी खामोशी से होगा ,लोग जाने से डरेंगे आप रोते हुए आए थे और खामोशी के साथ इस जहां से कूच कर जाएंगे। बस यादें ही रह जाएंगी वह भी कुछ चंद दिनों तक फिर लोग तुम्हें भूल जाएंगे। तुमने क्या किया? क्या नहीं किया ? इसको कोई याद नहीं करेगा तब बस आपकी यादें रह जायेंगी ,ना यह जिंदगी की भागमभाग न दौलत कमाने का झंझट ,बस सुकून ही सुकून रहेगा कब्र और श्मशान में। वक्त का यह तकाजा है खुद को महफूज(सुरक्षित) करिए दौलत कमाने के लिए ताउम्र उम्र पड़ी है। अभी मौत का संकट कटा नहीं है, संकट तो अब आ रहा है। अभी भी न चेते तो इतिहास के पन्नों में सिमट कर बस नाम ही रह जाएंगे। जिस काम के पीछे जान की बाजी लगाकर चलते रहे न वो काम रहा ना वो काम करने वाला, बस है तो उसका वह नाम और तस्वीरों में चढ़ी हुई एक सफेद माला। सामने बैठे हैं कुछ अपने जो जीते जी कभी मिलने नहीं आए मौत की बात सुनने पर भी दूरियां बना ली, बहाने बना लिए आज आपके लिए शोक सांत्वना देने आ रहें हैं। किसी ने क्या खूब कहा है –
वो दिन -रात कमाता रहा ।
अपनों की खुशी के लिए ।।
जब वो इस जहान से गया।
न अपने थे न अपनों की खुशी ।।
उस अंतिम घड़ीमें कोई साथ था तो वह सफेदपोश भगवान
जिन्हें डॉक्टर कहा जाता है।