लेखक:- महेंद्र पाल सिंह
मैं आपका गाँव बोल रहा हूँ
====================
मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर ये आरोप लगता रहा है कि यहाँ रहोगे तो भूखे मर जाओगे। मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप लगता रहा है कि यहाँ अशिक्षा रहती है। मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर असभ्य और जाहिल गंवार होने का भी आरोप लगता रहा है।
हाँ ! मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप लगाकर मेरे ही बच्चे मुझे छोड़कर दूर सुख की खोज में बड़े – बडे शहरों में चले गए। जब मेरे बच्चे मुझे छोड़कर जाते हैं तो मैं रात भर सिसक-सिसक कर रोता हू। फिर भी मरता नही। मन मैं एक आस लिए आज भी मेरी ये आँखें उनका इंतजार करती है कि शायद मेरे बच्चे आ जाये और हाँ! उन्हें देखने की ललक में वर्षो से सोया भी नही हूँ। लेकिन हाय ! जो जहाँ गया वो वहीं का होकर रह गया।
मैं पूछना चाहता हूँ अपने उन सभी बच्चों से कि क्या मेरी इस तथाकथित दुर्दशा के लिए जिम्मेदार तुम नहीं हो ? अरे ! मैंने तो तुम्हे कमाने के लिए शहर भेजा था की तुम शहर से कमा कर मुझे ला कर दोगे ! पर हाय ! तुम मुझे छोड़ शहर के ही हो गए।
मैने सोचा था कि तुम्हारी कमाई से आने वाली पीढ़ी के लिए सुखद मकान, अच्छा विद्यालय, उनके खेलने के लिए बढ़िया मैदान, आधुनिक अस्पताल, आदि -आदि बनाऊंगा ! क्योकि मैं जानता हूँ कि तुम मेरी इसी कमी के कारण मुझसे दूर शहर में जा कर रह रहे हो।
सरकारी अधिकारी व राजनेता बड़े होकर बड़े – बडे शहरों में रहते हैं इसलिए ये सुविधाएं वे शहर में तो देते है पर गांव को अपने हाल पर मरने को छोड़ देते हैं। पर मुझे उनसे नही तुमसे शिकायत है कि तुमने भी मुझे भुला दिया जिसके लिए मैं आज भी जी रहा हूँ ..।
पर आज मैं बहुत खुश हूँ ..
क्योकि मेरे बच्चे देश भर से भाग-भाग कर मेरे पास आ रहे है !! रेलगाड़ी या बस नहीं मिली तो सैकड़ों मील पैदल चलते हुए भी अपने परिवार को साथ लेकर आ रहे है।
जो बच्चे यह कहकर मुझे छोड़ शहर चले गए थे कि गाँव में रहेंगे तो भूख से मर जाएंगे, वो किस आस विश्वास पर पैदल ही गाँव लौटने लगे? मुझे तो लगता है निश्चित रूप से उन्हें ये विश्वास है कि गाँव पहुँच जाएंगे तो जिन्दगी बच जाएगी,भरपेट भोजन मिल जाएगा, परिवार बच जाएगा। सच तो यही है कि गाँव कभी किसी को भूख से नहीं मरने देता। हाँ मेरे लाल आ जाओ मैं तुम्हें भूख से नहीं मरने दूँगा।
आओ मुझे फिर से सजाओ, मेरी गोद में फिर से चौपाल लगाओ, मेरे आंगन में चाक के।