संवाददाता महेंद्र बाबू
इटावा: उत्तर प्रदेश के इटावा मुख्यालय पर करीब एक महीन तक लोगों के मनोरंजन के लिहाज से आयोजित होने वाला ‘इटावा महोत्सव’ कोरोना काल में रदद कर दिया गया है. 110 वर्ष पुरानी नुमाइश पर इस वर्ष संकट कोरोना की वजह आया है. पिछली एक शताब्दी से चाहे जो भी परिस्थितियां रहीं हों, यह नुमाइश लगातार चलती आ रही है, लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट को लेकर जो माहौल बना है और सरकार ने जो नियम निर्धारित किए हैं उनके चलते नुमाइश पर संकट है. महोत्सव समिति के सदस्य भी इस मामले में कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं. प्रतिवर्ष नवम्बर-दिसम्बर के महीने में महोत्सव लगता रहा है. एक शताब्दी से अधिक समय से चली आ रही इस नुमाइश में ने अब इटावा के लोगों के दिलों में अपना स्थान बना लिया है और वार्षिकोत्सव की तरह हो गई है. यही कारण है कि अब इसे इटावा महोत्सव भी कहा जाने लगा है. नुमाइश लगने से काफी पहले ही तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं. इस वर्ष मार्च के महीने से जो कोरोना संकट चला आ रहा है और अगस्त के महीने में भी लगातार मरीजों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है उसके चलते नुमाइश पर संकट है. सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाना है और नुमाइश में यह सोशल डिस्टेसिंग कैसे हो सकेगी. नुमाइश पंडाल के कार्यक्रमों में भी सोशल डिस्टेंसिंग मुश्किल है.यही नहीं, स्कूली बच्चों को नुमाइश से जोड़ा जाता है लेकिन इस दौर में जब पढ़ाई के लिए भी स्कूलों को नहीं खोला जा रहा है तो फिर नुमाइश कैसे संभव हो सकेगी.
नुमाइश कार्यकारिणी के सदस्य मेहरबान सिंह का कहना है कि सेहत सबसे पहले है और इसके लिए सभी नियमों का पालन किया जाना चाहिए. इटावा के उपजिलाधिकारी और महोत्सव समिति के महासचिव सिद्धार्थ का कहना है कि कोरोना काल में लगातार मामलों का बढ़ना और राज्य सरकार की ओर से लगातार नियमों में सख्ती बरतना यह प्रमाणित करता है इस आयोजन की फिलहाल किसी भी तरह की अनुमति नहीं दी जा सकती है.इस आयोजन में कई लाख लोगों की हिस्सेदारी होती है जो कोरोना को प्रभावी कर सकता है. वहीं, महोत्सव समिति के वरिष्ठ सदस्य राजकिशोर बाजपेई खुद कोरोनो संक्रमित हो चुके है जिस कारण महोत्सव की कोई बैठक का आयोजन नहीं हो पाया है.

इटावा प्रदर्शनी एवं पशुमेला से इटावा महोत्सव तक का सफर
एक महीने तक आयोजित होने वाले इस महोत्सव में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इटावा महोत्सव की जिले में ही नहीं बल्कि प्रदेश में अपनी अलग पहचान है. वैसे इटावा प्रदर्शनी का आरंभ 1888 में तत्कालीन जिलाधिकारी एचजी अलेक्जेंडर द्वारा एक छोटे से मेले के रूप में पक्का तालाब पर किया गया था. उसके बाद यह बंद हो गया था, लेकिन सन 1910 में जिला मजिस्ट्रेट एचके ग्रेसी द्वारा इसे पुनर्जीवित किया गया.
आरंभिक दिनों में पशु मेले का आयोजन नहीं होता था, लेकिन बाद में पशु मेला शुरू हो गया और पक्का तालाब से प्रदर्शनी को हटा कर वर्तमान स्थल पर ले आया गया. सेठ विशुनदास द्वारा प्रथम विष्णु द्वार, ताखा के सेठ बदन सिंह द्वारा कोलकाता से मंगाए गए पाम के वृक्ष, ज्वाला प्रसाद तिवारी हरदोई वाले द्वारा उत्तरीद्वार व 1922 में राय बहादुर भटेले व श्याम बिहारी लाल बिरारी द्वारा पश्चिमी द्वार और रानी साहेबा लखना द्वारा दक्षिणी द्वार का निर्माण कराया गया. महोत्सव की एक विशेषता है कि ये ग्वालियर के मेले के बाद एकलौता ऐसा महोत्सव है जो अपने निजी पक्के और विशाल प्रांगण में आयोजित किया जाता है. पहले इसका नाम इटावा प्रदर्शनी एवं पशुमेला के नाम से किया जाता था, बाद में इसका नाम इटावा महोत्सव कर दिया गया. महोत्सव को आयोजित किये जाने वाले प्रांगण के एक हिस्से का निर्माण सन 1910 में किया गया था जो कि धीरे धीरे विशाल प्रांगण में तब्दील होता गया है. आज इस महोत्सव की विशाल चार दीवारी के अंदर सैकडों दुकानें, पार्क और बड़े बड़े मैदान हैं.