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Bihar news : मुंशी प्रेमचंद और आज का साहित्य

जनवाद टाइम्स 1 August 2021
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संवाददाता. मोहन सिंह बेतिया

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने अंग्रेजी हुकूमत की अमानवीय कारवाई , गुलामी की दौर में कठोर जुल्मों सितम और सामंतों के अंग्रेज परस्ती पर अपनी बेबाक लेखनी चलायी । भारत की गुलामी, सामंती शोषण, गैरबराबरी, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, बाल विवाह, छूआछूत, कृषि संकट, मजदूरों की समस्याओं पर अपने विचार वेवाक विचार व्यक्त करते रहे और एक बेहतर इंसान तथा बेहतर समाज बनाने की सपनो को देखा और जीवन भर इसके लिए पुरजोर संघर्ष किया । उन्होंने 300 से ज्यादा कहानियां और दर्जनों उपन्यास लिखे, नाटक लिखे, कविताएं लिखी और यह सब उन्होंने समाज और मनुष्य को जगाने के लिए किया।
मुंशी प्रेमचंद “कलम का सिपाही” बने । उन्होंने हमारे अंदर की कमजोरियों पर हमला कर जहन से निकालने तथा इंसानियत को जगाने के लिए ऐसे सकारात्मक चरित्रों का निर्माण करने पर जोर दिया । जो वासनाओं और गुलामी के चंगुल में न फंसे । बल्कि उनका दमन करें और विजयी सेनापतियों की तरह दुश्मनों का संहार करते हुए विजयी बन कर आगे बढ़ें । साहित्यकारों के बारे में वे लिखते हैं कि” साहित्यकार का लक्ष्य केवल मेहफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नही है । वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नही है । *बल्कि उनके आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है* प्रेमचंद जी कहते हैं कि साहित्य उस रचना को कहते हैं जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो ।
प्रेमचंद जी हर प्रकार की लूट खसोट, शोषण अन्याय , भेदभाव , गैरबराबरी, जुल्म और ज्यादती का खात्मा यानि समाज में वर्गीय परिवर्तन चाहते थे । कर्मभूमि में वे कहते हैं कि इंकलाब की जरूरत है , पूर्ण परिवर्तन के लिए । उन्होंने अपनी रचनाओं में गरीबों, महिलाओं और शोषण के शिकार लोगों को बोलने की आजादी दी है , बोलना सिखाया है , जुल्म का विरोध करने का हौंसला प्रदान किया ।
अपनी रचनाओं में उन्होंने औरतों और मजदूरों को विद्रोही बनाया । उन्हें दब्बू नही लडाकू बनाया । उन्हें संघर्ष करना सिखाया । उनके अनुसार औरत की समस्या समाज की प्रक्रियाओं से निकली है। अतः जब तक समाज व्यवस्था नही सुधरेगी । तबतक औरतों की समस्याऐं भी नही सुलझ सकती हैं ।

 

Bihar news : मुंशी प्रेमचंद और आज का साहित्यप्रेमचंद कहते हैं कि पक्षपाती लोग कभी स्वराज्य नही ला सकते । हिंदू मुस्लिम एकता और एकजुटता एवं सौहार्द के बारे में वे कहते हैं कि भारत में हिंदू और मुसलमान एक ही नाव में सवार हैं। डूबेंगे तो दोनों साथ डूबेंगे और पार होंगे तो दोनों साथ पार लगेंगे । देश और समाज को बांटने वाली साम्प्रदायिक ताकतें भारतीय नही ,विदेशी सोच है ।
वे साम्प्रदायिकता को एक कोढ समझते थे । हिंदू मुस्लिम एकता को वे स्वराज्य का प्रतीक समझते थे । वे कहते हैं कि हम पूंजीपतियों का नही, गरीबों, कास्तकारों और मजदूरों का स्वराज्य चाहते हैं । वे कहते हैं कि स्वराज की लडाई और कोई नही ,स्वयं जनता को लडनी पड़ेगी ।
वे कहते हैं कि साहित्यकार चारदिवारियों का बंदी नही, पूरी दुनिया उसकी वर्कशाप है । अपनी समस्त रचनाओं में वे लगातार समता और इंसानियत की वकालत करते हैं । वे कहते हैं कि कला जगाने का माध्यम है । सिर्फ सजाने का नही । वे कहते हैं कि साहित्य का मुख्य लक्ष्य है कि वह समाज शिक्षित करे । जो साहित्य को जनता के संघर्षों से जोडता है । वही श्रेष्ठ साहित्य की रचना कर सकता है ।
प्रेमचंद सभी तरह के अत्याचार , शोषण , अत्याचार और बुराईयों से घृणा करने की बात करते हैं और कहते हैं कि इन से जितनी नफरत की दृष्टि होगी । उतने ही उत्कृष्ट साहित्य का सृजन होगा । वे लिखते हैं कि अछूतों की असली समस्या आर्थिक है और उसे समाप्त किए बिना अछूत समस्या का समाधान नही हो सकता ।
वे आजादी के बाद देश में किसानों और मजदूरों की हुकूमत चाहते थे । यह तथ्य आज भी उतना ही सत्य है क्योंकि किसानों और मजदूरों के सरकार व सत्ता के बिना उनका कल्याण संभव नही हो सकता है, इसी कारण वे तमाम तरह की समस्याओं , किसानों की बदहाली और आत्महत्या का कोई समाधान आजादी के सत्तर सालों में नही निकल पाया है.
प्रेमचंद आज होते तो वे साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार,, समाज में बढती जा रही मक्कारियों पर करारी चोट करते । समाज में फैलायी जा रही धर्मांधताओं और अविवेकशीलता व अवैग्यानिकता के परखचे उडाते. गुमराह बुध्दिजीवियों को , गौ-रक्षकों पर करारा प्रहार करते और समता, समानता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, आजादी, सच्चे गणतंत्र समाजवाद, किसानों मजदूरों के संस्कृति, साम्प्रदायिक सौहार्द और जन वैज्ञानिक विवेक के लेखक और ध्वजवाहक के रुप होते ।.

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