सुनील पांडेय : कार्यकारी संपादक
हाल ही में भारतीय समाचार पत्रों के संगठन इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आईएनएनएस) ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा (एफिडेविट )दाखिल करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों के ऊपर विज्ञापन के मद पर विभिन्न मीडिया संगठनों ( घरानों ) का लगभग अट्ठारह सौ करोड़ रुपया बकाया है। जिसके भविष्य में मिलने की कम ही संभावना है आईएनएन एस ने अपने हलफनामे में आगे जिक्र किया है की मीडिया उद्योग की माली हालत अत्यंत खराब है। वहीं दूसरी तरफ न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन ( एनबीए )अपने एक अलग हलफनामे में इस तथ्य की ओर भारत की सर्वोच्च अदालत का ध्यान खींचा है । आईएनएस एवं एनबीए ने अपना जवाब पत्रकारों के संगठन नेशनल अलायंस ऑफ जर्नलिस्ट ,दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट और मुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की जनहित याचिका पर दिया है। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए)द्वारा दाखिल हलफनामें में इस बात का उल्लेख किया गया है कि कोरोनावायरस के चलते लॉक डाउन से समाचार उद्योग का कारोबार गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। मीडिया उद्योग के आर्थिक संकट से उबारने हेतु सरकार ने किसी तरह के आर्थिक पैकेज या उपायों की कोई घोषणा नहीं की है। जबकि यह उद्योग अत्यंत विषम परिस्थिति के दौर से गुजर रहा है । विभिन्न पत्रकारों के संगठनों ने याचिका में आरोप लगाया है कि समाचार पत्रों के प्रबंधकों, पत्रकारों सहित अन्य कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है तथा साथ ही साथ मनमानी वेतन की कटौती भी हो रही है। कहीं ना कहीं मीडिया जगत से जुडे़ लोगों को जीविकोपार्जन का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। लोकतंत्र की चतुर्थ स्तंभ मीडिया पर क्या सरकार का यह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार उचित है। मेरे जैसे पत्रकारों की राय में सरकार को इस विषम परिस्थिति में मीडिया जगत की मदद करनी चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय से एक पत्रकार होने के नाते मेरी और मेरे जैसे अन्य लोगों विनम्र अपील है की सरकार को मीडिया जगत पर कुछ आर्थिक सहायता जारी करने का आदेश दे। इससे मीडिया जगत को फौरी राहत तो अवश्य मिल जाएगी तथा साथ ही साथ सरकार की यह आर्थिक मदद मीडिया जगत के गिर रहे आर्थिक स्थिति में संजीवनी का कार्य करेगी। वर्तमान समय में मीडिया जगत की कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी के चलते आई आर्थिक मंदी में जिन लोगों के नौकरी जाने का संकट मंडरा रहा है शायद बच जाए ।