संवाद लेखन : डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार
राजा ,प्रजा ,संत ,धनवान ,पशु पक्षी विपत्ति काल में दुख से भरा हुआ गला शायद शब्दों का सही उच्चारण करने में समर्थ नहीं होता ,संकेत यह बताते हैं क्या यह प्राणी दुखित है l

कुछ एक संकेत जिसमें सूटकेस पर बच्चों को लिटा कर मां का खींचना ,विकलांग महिला द्वारा पीठ पर बच्चा बांध कर चलना, ट्रकों के ट्रालो में भूसे की तरह भरे स्त्री पुरुष, बच्चे की लाश को कंधे पर चिपका कर सैकड़ों किलोमीटर तक चलना , गर्भवती का बच्चों वाली गाड़ी पर बैठकर खींचना ,कंधे पर बांस के दोनों ओर बच्चों को पलड़े में लेकर चलना, वृद्ध मां बाप को पीठ पर बिठा कर चलना , बिना भोजन नंगे पर निरंतर और निर्बाध गति से चलना उस पर सूर्य की तपिश धन्यवाद है तेरा मुसाफिर! तू अपने गंतव्य को प्राप्त हो l

जब इन मुसीबतों को झेलने वाले निरंतर बिना थके चल रहे हैं उस पर लाठियों का स्वाद तेरा दो बदन लहूलुहान हो गया है रे! अरे मुझ में तेरे चित्र देखने की हिम्मत नहीं है तूने कैसे सहा होगा l वहीं सड़क और रेलवे लाइन पर तेरे मांस के लोथड़े तेरी यात्रा का समापन बन गए हैं कैसे सहा होगा ,तूने और तेरे परिवार जिसके पास तू जा रहा था उनका क्या हाल हुआ होगा, तूने अपना वादा नहीं निभाया मां ,बच्चे ,पत्नी ,बूढ़ा पिता तेरे आने की अब तक राह देख रहा है l

पिता ने कहा कि सरकारी सहायता के भरोसे मत रहना मेरा जी भर रहा हैl तू मेरा पुत्र है और बिना हार माने तू मेरे असले खून का परिचय दें और पैदल चल कर घर आजा यह तेरी अग्नि परीक्षा है l रे !अभागे पुत्र और पिता तेरा दीदार नहीं हो सका यह वृद्ध श्राप दे देता कि भारत तू उजड़ जा फिर सोचता है कि मेरे पुत्र जैसे कितने पुत्र राह में चल रहे हैं l मैं कैसे बताऊं ? तेरी मां को तेरी पत्नी व तेरे बच्चों को, यह क्या हो गया? अब उन्हें समझाने का मेरे पास कोई विकल्प नहीं रह गया है मेरे पुत्र तूने देश का नमक खाया था चल आज उधारी चुका दी ,लेकिन मेरे प्रेम और स्नेह का क्या हुआ अभी वह उधारी बाकी है तू आ जा मैं तुझसे अब अपनी उधारी नहीं मांगूंगा l

यह करुणा क्रंदन इतिहास के पन्नों पर अंकित होगा किंतु इतिहासकारों के समक्ष यह कठिनाई होगी कि कितने लोग मरे? कितने पैदल चले ? कितनी गर्भवती स्त्री थी? कितने अबोध बच्चे थे ? कितने मृतक बच्चे लाश बनकर पिता के कंधे से चिपक कर चले ? कितने नंगे पर चले? कितने विकलांग थे ? प्रत्येक मुसाफिर के पास कितना सामान था ? किसने किस योजना की रोटी खाई? किसने पुलिस की लाठियों से लहू भारत की सड़कों पर गिराया? इस काल में मंत्री, प्रधानमंत्री ,वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री ,गृह मंत्री एवं अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री क्या कर रहे थे आदि आंकड़ों के अभाव में इतिहास अधूरा रह जाएगा किंतु इतिहास पर वर्तमान प्रश्न अवश्य करेगा l

सच में सड़कों पर जीवन दोराहे पर है योजना प्रयोजन शून्य हैं ,आंकड़े नदारद हैं ,मौतें आवाज दे रही हैं कि राजन! मैं तो चला मैं माफ नहीं करूंगा , यदि मैं करता भी हूं तो यह इतिहास तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा l

इतिहास में मेरा जिक्र हो ना हो तो मैं ,हमारे माता पिता, मेरे बच्चे, मेरी पत्नी शायद कभी माफ नहीं करेंगे जिनके बुढ़ापे का सहारा ,बच्चों का सहारा ,पत्नी का सिंदूर छिन गया है l
मेरी सलाह है कि आज भी हमारे जैसे लाखों लोग जिंदगी व मौत से जूझ रहे हैं हो सके तो उन्हें बचा लो शायद हमारा श्राप कुछ कम हो जाएगा l