देश काल और परिस्थिति : भारतीय कामगार मजदूरों की पीड़ा

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सुनील पांडेय  : कार्यकारी संपादक

हम मजदूर हैं साहेब हमारी कौन सुनेगा । हम तो हर युग में सताए गए हैं। हर युग में हमारा शोषण हुआ है बस युग बदलते ही शोषक का नाम बदल जाता है लेकिन हमारा शोषण कभी बंद नहीं होता । हमारा जन्म ही शोषण सहन करने के लिए हुआ है। हमारी पीड़ा का किसी से क्या लेना देना।

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हम समाज के सबसे दबे ,कुचले वर्ग के लोग हैं। इस देश की अर्थव्यवस्था में भी हमारे योगदान की कोई गिनती नहीं होती है। हम दिन -रात मेहनत करते हैं लेकिन हमें मिलता क्या है किसी तरह दो जून की रूखी सूखी रोटी। प्रत्यक्ष रूप से देश की अर्थव्यवस्था में हम न के रूप में ही भागीदारी करते हैं ,लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से हमारे खून- पसीने से ही देश की अर्थव्यवस्था को एक गति मिलती हैं। आपदा की इस विषम घड़ी में भी हमारी दशा से किसी को क्या लेना देना। हम मर भी जाएं या हमारा परिवार खत्म हो जाए तो भी देश की अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ने वाला ।

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हमारे बच्चे भी बड़े घर के लोगों के बच्चे की तरह नहीं है कि उनको लेने एसी बसें जाएंगी । विपदा की इस विषम परिस्थिति में हम हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव आ रहे हैं। हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है । हमारे पास न खाने की व्यवस्था है न रहने की व्यवस्था है और न ही हमें घर पहुंचाने की कोई व्यवस्था है। हम जहां काम करते हैं जब हमारा फैक्ट्री का मालिक या ठेकेदार ही हमारा नहीं हुआ तो हमें सरकार से क्या उम्मीद। हम जीतोड़ दिन- रात मेहनत करते हैं इस पर भी हमारी मजदूरी हमें समय पर नहीं मिलती। आज हमारी यह दशा है हम चाहे जितना गिड़गिड़ा लें ,रो लें ,चाहे जितनी मिन्नतें करलें हमारा कोई सुनने वाला नहीं । हम देश के विभिन्न शहरों से हजारों किलोमीटर दिन -रात पैदल चल कर अपने गांव आ रहे हैं। हमारा ना प्रशासन मदद कर रहा है और ना ही समाजसेवी संस्थाएं । हां हमारे इस पदयात्रा में मीडिया जरूर हमसे बात करता है ,हमारी पीड़ा को साझा करता है। हमें लगता है कोई तो है जो हमारी पीड़ा समझता है हमारे दर्द को बांटता है । हमारी आवाज भी अपने समाचार पत्र या टीवी चैनल के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने का प्रयास करता है। लेकिन जैसे सरकार अंधी ,बहरी और गूंगी है उसे हमारी दशा से जैसी कोई वास्ता ही नहीं। यदि होता तो वह हमारी मदद करती ।हम और हमारे छोटे -छोटे बच्चे दिन -रात पैदल चल रहे हैं यहां तक कि उनके पैरों में चप्पल तक नहीं है ,पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गए हैं ,उनको देखने वाला कोई नहीं है। हम अपनी पीड़ा किस से कहें ,कौन हमारी सुनेगा, कौन हमारी मदद करेगा। लॉक डाउन के समय में हमसे तो किसी का कोई फायदा भी नहीं है ,लोग सोचते हैं यदि इससे हम कुछ पूछेंगे तो यह हमसे कुछ मांगेगा ही। इसीलिए हमारी तरफ कोई देखता ही नहीं। हम ऐसे सफर के मुसाफिर हैं जिसको यह भी नहीं पता हम अपने मंजिल तक पहुंचेंगे या बीच सफर में ही दम तोड़ देंगे । हां हम तो दर्द सहने वाले लोग हैं हमारे जख्म पर आखिर मरहम कोई क्यों लगाए। हम किसी के लगते ही क्या हैं ,हमारा किसी से रिश्ता ही क्या है। हम मजदूर हैं आप मालिक हैं बस इतना ही हमारा आपका रिश्ता है । हमारे रिश्ते में मानवता शब्द का कहीं भी प्रयोग ही नहीं होता। हमें जब भी जो चाहे गाली दे दे और मारपीट दे। हमें तो दर्द होता ही नहीं, हम उफ भी नहीं कर सकते ,क्योंकि हम तो लोहे के बने हैं । सुना है कल सरकार ने 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज जारी किया है । 20 लाख में कितने शून्य होते हैं हमें यह भी नहीं मालूम है। हम खुश थे इसमें हमारा भी कुछ ना कुछ हिस्सा होगा। आज हमने एक पत्रकार से पूछा भैया सरकार ने जो इतना ढेर सारा पैसा जारी किया है उसमें हमारा कितना हिस्सा है, क्या हमारे हाथ में भी कुछ रुपए आएगा। वह हंसने लगा उसने कहा यह पैसा तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों को अर्थव्यवस्था में गति प्रदान करने के लिए दिया जा रहा है इसमें तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं । हां यह उद्योगपति जब कल -कारखाने या उद्योग लगाएंगे तो .वहां तुम्हें काम मिलेगा और इसके बदले तुम्हें तुम्हारी मजदूरी इस पैसे से देंगे ,बस यही तुम्हारा हिस्सा है। भैया हमारे लिए सरकार ने इतनी बड़ी रकम में प्रत्यक्ष रूप से हमें एक पैसा भी नहीं दिया। हम कैसे जिएंगे क्या खाएंगे ,यदि हम चलते -चलते अपने घर पहुंच भी गए तो भूख से मर जाएंगे। हमारे मरने पर भी कोई रोने वाला नहीं है, क्योंकि हम मजदूर हैं मजबूर हैं हमारी हालात पर लोगों को बस दया आती है। हमारी इस हालात का जिम्मेदार कौन है शासन प्रशासन या हम खुद यह तो हमें भी नहीं पता।

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