रिपोर्ट विजय कुमार
बस्ती जिले के रहने वाले 28 वर्षीय कुंदन, जो नौकरी के लिए प्रवेश परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ भविष्य में शिक्षण संस्थान (कोचिंग) खोलने का सपना लिए प्रयागराज आये थे | यहाँ आकर टीबी जैसी बीमारी का शिकार हो गए, अब स्वस्थ होकर दूसरों को इस रोग के प्रति जागरूक करने की ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं|

कुंदन बताते हैं कि वर्ल्ड विजन संस्था से जुड़कर अक्टूबर 2022 से टीबी चैंपियन के रूप में काम कर रहे हैं | अब तक लगभग 400 लोगों को काउन्सलिंग के माध्यम से इलाज में मदद पहुंचा चुके हैं एवं भ्रांतियों के प्रति जागरूक कर चुके हैं| इसके साथ ही कई टीबी मरीजों को सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ दिलाने में भी सहयोग कर रहे हैं, जिससे वह सक्षम बन सकें|

कुंदन बताते हैं – वह एक संपन्न परिवार से हैं और जुलाई 2021 में प्रयागराज आए थे| कुछ ही महीनों बाद अचानक अक्टूबर माह से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा| शाम को हल्का बुखार चढ़ना, वजन में लगातार गिरावट, भूख न लगना जैसी समस्याएं होने लगीं | चलने फिरने पर पेट में दर्द और खाने में दिक्कत भी हो रही थी| कुछ समय मेडिकल स्टोर से दवाएं लीं पर हालत में सुधार न होने पर एक प्राइवेट डॉक्टर को दिखाया| जाँच में खून की कमी आई जिसके बाद दवा चली, लेकिन पेट की दिक्कतें अब भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थीं|
एक दोस्त की सलाह पर स्वरूप रानी अस्पताल, प्रयागराज में गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट को दिखाया जिन्होंने अल्ट्रासाउंड कराने पर पेट में पानी भरने की बात कही| जाँच के लिए सैंपल लिया गया और रिपोर्ट में पता चला कि मुझे आँतों की टीबी है| कुंदन ने बताया – “मन में एक डर सा हो गया था| जब परिवार को इसकी जानकारी दी तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि पेट में टीबी हो सकती है क्योंकि सबको लगता था टीबी केवल फेफड़ों की बीमारी है | उन्होंने कई बार मुझे वापस घर आने के लिए कहा लेकिन मैंने ठान लिया था कि अपना सपना पूरा किये बिना घर वापस नहीं जाऊंगा| डॉक्टर से मिलकर अपनी शंकाएं दूर की| उन्होंने बताया कि आँतों की टीबी का संक्रमण फैलता नही हैं, इलाज का कोर्स लगभग छह से नौ महीने लगातार करने से यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है| हॉस्टल में अपने सभी काम और पढ़ाई करते हुए छह महीने तक टीबी का पूरा इलाज लिया| खाने-पीने का विशेष ध्यान रखा जिससे अब मैं पूरी तरह से ठीक हो गया हूँ।“
कुंदन बताते हैं – अगर किसी को टीबी है तो वह भी मेरी तरह ठीक हो सकता है। ज़रूरी है नियमित रूप से दवाई और पौष्टिक खानपान का सेवन करना। टीबी का पूरा इलाज सरकारी अस्पताल में संभव है। मैंने भी सरकारी अस्पताल से पंजीकरण करा कर टीबी की दवा ली और निक्षय पोषण योजना के तहत इलाज के दौरान प्रतिमाह मिले 500 रुपये से पोषण आहार भी लिया।
बाहर जाकर भी स्वास्थ्य के प्रति ध्यान देना ज़रूरी – जिला क्षय रोग अधिकारी
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. अरुण कुमार तिवारी का कहना है – अक्सर लोग काम काज और पढ़ाई के सिलसिले में घर से दूर दूसरे शहर जाते हैं और इस कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है| इससे अक्सर वह अपनी सेहत का ध्यान नहीं रख पाते और संक्रमण या बीमारियाँ उन्हें घेर लेती हैं| टीबी की पुष्टि वाले मरीजों को सरकार नजदीकी डॉट्स सेंटर से दवा से लेकर आर्थिक सहयोग तक की सुविधा दे रही है। कुंदन जैसे चैंपियन के सहयोग से मरीजों को इलाज पूरा करने मे मदद की जा रही है। यदि प्रवासी एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं तो इलाज बंद करने की ज़रुरत नहीं है। सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाईजर से संपर्क कर इलाज दूसरे शहर में रेफर करा सकते हैं। उन्होंने बताया कि जिले में 12 टीबी चैम्पियन काम कर रहे हैं जोकि टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में सहयोग कर रहे है |
चैंपियन के सहयोग से बढ़ रहा मरीजों का भरोसा
लाभार्थी सनोज कुमार (बदला हुआ नाम) उम्र 34 वर्ष निवासी अमोलवा खुर्द देवली प्रतापपुर के रहने वाले हैं और चाट फुल्की का ठेला लगाते थे | उन्होंने बताया कि जब मुझे बीमारी की खबर हुई तो मैं बिलकुल टूट गया था और परेशान था कि अब मैं ठीक हो पाउँगा की नहीं, इलाज कैसे होगा लेकिन मेरी समस्याओं के जवाब में कुंदन भैया टीबी चैंपियन का साथ मिला | उन्होंने हर समय मेरी मदद की और मेरे सवालों के जवाब दिए अब मैं खुद को काफी मजबूत समझता हूँ |