भारत में शैक्षिक स्तर बढे़गा तो जातिवादिता में कमी आयेगी
सुनील पाण्डेय- कार्यकारी संपादक
जातिवादिता भारतीय समाज में कुष्ट रोग सदृश्य है।सभ्यता के प्रारम्भ में यदि हम अवलोकन करें तो उस समय हम पशुवत जीवन व्यतीत करते थे। हम अपनी क्षुधापूर्ति के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरण करते थे। आज हम सभ्य हैं, संस्कारित हैं ,लेकिन हमारे अंदर एक सबसे बड़ी कमी आ गई है वह है जातिवादिता ।आज हम जातिवादिता की बेड़ी में पूरी तरह से जकड़ चुके हैं । यहां यह बताना आवश्यक है कि जातिवादिता किसी ना किसी रूप में विश्व के सभी देशों में कमोबेश पाई जाती है ,पर एक गंभीर सामाजिक कुरीति के रूप में यह भारतीय हिंदू समाज की एक विशेष विशेषता बन गई है। वैसे संसार के अन्य धर्मों में इस्लाम एवं ईसाई धर्म भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहे हैं। यह व्यवस्था भारत की एक अत्यंत प्राचीन व्यवस्था रही है। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि जातिवादिता की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई । तत्कालीन समय में पेशेे के आधार पर समाज को 4 वर्गों में वर्गीकृत किया गया था – ब्राह्मण, क्षत्रिय. वैश्य एवं शूद्र ।

प्रथम वर्ग के अंतर्गत ब्राह्मण आते थे जिनका कार्य धार्मिक और वैदिक कार्यों का संपादन करना था। वही दूसरे वर्ग के अंतर्गत क्षत्रिय आते थे जिनका कार्य देश की रक्षा करना और शासन प्रबंध करना था। तीसरे वर्ग के अंतर्गत वैश्य आते थे जिनका कार्य कृषि एवं वाणिज्य से संबंधित कार्य करना था ।जहां तक चौथे वर्ग की बात है इसके अंतर्गत शूद्र अर्थात दलित वर्ग के लोग आते थे इनका कार्य अन्य तीनों वर्ग की सेवा करना था। प्रारंभ में जाति प्रथा के बंधन इतने कठोर न थे और वह जन्म पर नहीं अपितु कर्म पर आधारित थी ।कालांतर में जाति प्रथा के बन्धन में कठोरता आती गई ,वह पूर्णतया जन्म पर आधारित होती गई तथा एक जाति के लोग दूसरी जाति में अंतःक्रिया अब असंभव सी हो गई । इसके पीछे कहीं ना कहीं सवर्ण मानसिकता उत्तरदाई थी। सवर्णों में अपने वर्ण के प्रति उच्चता की भावना का दंभ होने लगा। वे अपने को अन्य तीनों वर्गो से उच्च समझने लगे और उन तीनों पर अपने आधिपत्य स्थापित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे। जिस का प्रतिफल है कि आज भारत में जातिवादिता का दंश पूरी तरह से व्याप्त है । विशेष कर क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ग पर इसका प्रभाव कम ही पड़ा, लेकिन शूद्र अर्थात दलित वर्ग पर इसका प्रभाव सर्वाधिक पड़ा। आज भी यदि कोई वर्ग सर्वाधिक प्रभावित है तो वह शूद्र अर्थात दलित वर्ग ही है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह सर्वथा सत्य है शैक्षिक स्तर बढ़ने पर जातिवादिता में पहले की अपेक्षा कमी अवश्य आई है, लेकिन पूरी तरह से अभी समाप्त नहीं हुई है। जब तक या पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाती तब तक देश का विकास संभव नहीं है, क्योंकि समाज का विकास उसके सभी वर्गों के विकास के साथ जुड़ा होता है ।जब तक समाज का एक वर्ग भी विकास से अछूता रहेगा तब तक देश प्रगति नहीं कर सकता है। शूद्र अर्थात अर्थात दलित वर्ग को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ब्राह्मण ,क्षत्रिय एवं वैश्य तीनों वर्गों को मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा।तभी देश का विकास संभव है नहीं तो हम दुनिया के अन्य देशों से पीछे रह जाएंगे। यह सर्वथा सत्य है जातिवादिता देश समाज एवं राजनीति तीनों के लिए बाधक है। या जितनी जल्दी समाप्त हो जाए उतना ही अच्छा होगा।
दुनिया के सभ्य देशों में जातिवदिता उतनी हावी नहीं है जितना कि हमारे देश भारत में है। भारत में धर्म एवं जाति के नाम पर नित नए दंगे होते हैं। इन दंगों में अनायास बहुत से लोग काल कवलित हो जाते हैं। वर्तमान समय में यह हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है जिसका खामियाजा हमारे इन निरीह लोगों को भुगतना पड़ता है। जातिवादिता देश को जोड़ने का नहीं वरन् तोड़ने का कार्य करती है। हमारे देश में कई धर्म एवं जाति के मानने वाले लोग निवास करते हैं। उनमें आपस में स्नेह ,सद्भाव नहीं वरन् द्वेष बना रहता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है। हमें आपस में मिलजुल कर एक दूसरे के साथ भाईचारे की भावना से कार्य करना चाहिए। इससे हमारे देश का समग्र विकास होगा। हमें स्वाधीनता प्राप्त हुए लगभग 7 दशक से अधिक समय बीत चुके हैं ,लेकिन हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम ही हैं । हम अपने देश में ही अपने भाई बंधुओं को ऊंच-नीच की दृष्टिकोण से देखते हैं। उन्हें नीचा दिखाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं ।हम यह सोचते हैं यह बड़ा है यह छोटा है यह अछूत है। जब तक हम इस मानसिकता का त्याग नहीं करेंगे तब तक हमारे देश का विकास कदापि संभव नहीं है। यदि हम ऐसा करते रहें तो दुनिया के कई देशों से पीछे रह जाएंगे। 21वीं सदी विकास का युग है ना कि जातिवादिता का युग। हमें इस लाइलाज बीमारी का इलाज ढूंढना होगा ।यह तभी संभव है जब हम इस ओर ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा पूर्वक प्रयास करेंगे।