सुनील पांडेय : कार्यकारी संपादक
भारत के लिए यह सबसे बड़ी विडंबना है हमारे जितने भी पड़ोसी देश हैं ,उन्हें जब -जब मौका मिला भारत के पीठ पर छूरा ही घोपा । इनमें चाहे वह पाकिस्तान हो, बांग्लादेश हो, नेपाल हो या चीन सभी अवसर का फायदा उठाकर हमें जब -तब नुकसान ही पहुंचाते हैं। हम एक अच्छे पड़ोसी देश के रूप में उनके साथ जब- जब मित्रवत संबंध स्थापित करने की बात सोचते हैं तब -तब इन पड़ोसी देशों द्वारा हमेशा शत्रुवत संबंध के रूप में जवाब मिला। यहां पर आगे हम भारत चीन संबंधों का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आधार पर कर रहे हैं। कभी हिंदी चीनी भाई भाई का नारा देने वाला हमारा पड़ोसी देश चीन एक अवसरवादी देश है। उसके द्वारा अब तक दिए चोट से तो यही साबित होता है कि उसकी कथनी और करनी में पर्याप्त अंतर है। इतिहास के पन्नों पर यदि हम नजर डालें तो स्वाधीनता प्राप्त के बाद भारत के लिए चीन सबसे बड़ी सामरिक चुनौती रहा है। इस सच को झूठलाया नहीं जा सकता 50 के दशक में भारत जहां शांति के पथ पर चला वहीं चीन ने अक्साई चीन को अपने कब्जे में ले लिया। उस समय चीन ने भारत की 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जा कर लिया था । 1962 के भारत चीन युद्ध से पूर्वी चीन भारत से आपसी बातचीत के द्वारा सीमा विवाद सुलझाने की बात करता रहा। इसी बीच मौके का फायदा उठाकर 1962 के नवंबर माह में चीन ने अचानक भारत पर सुनयोजित हमला किया । यदि इस युद्ध की बात करें तो उस समय दोनों देश की सेनाओं के मध्य एक हिंसक झड़प हुई थी। तत्कालीन समय में चीनी सेनाओं ने लगभग 4 माह तक गोरखा सैनिकों की पोस्ट को घेर रखा था। उस समय हुई उस सैन्य झड़प में 33 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। भारत चीन युद्ध के पश्चात वास्तविक नियंत्रण रेखा पर इस घटना के पूर्व अब तक दो बड़ी हिंसक घटनाएं हुई हैं ।पहली घटना वर्ष 1968 में सिक्किम में हुई जिसमें हमारे 88 सैनिक शहीद हुए थे ,जबकि उस समय चीन के 300 से ज्यादा सैनिक हताहत हुए थे। वहीं दूसरी घटना का जिक्र करें तो वर्ष 1975 में अरुणाचल प्रदेश में हुई, उसमें असम राइफल के जवानों पर चीन द्वारा हमला किया गया था ।1962 के समय गलवान घाटी पर जो स्थिति बनी थी कमोबेश ऐसी ही स्थित अभी बन रही है। उस समय भी भारत एवं चीन में युद्ध का कारण गलवान घाटी ही थी और अब भी वही गलवान घाटी दोनों देशों के मध्य सीमा विवाद का प्रमुख कारण है। भारत चीन के मध्य तीसरी घटना वर्तमान समय में वर्ष 2020 में घटी । भारत एवं चीन के मध्य बीते माह मई के पहले हफ्ते से तनाव चल रहा है ।तनाव को कम करने के लिए सैनिक एवं कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों के मध्य बातचीत भी जारी थी। पूर्व में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मई के पहले हफ्ते से जारी अब तक की तनातनी के पश्चात 15 जून को देर रात भारतीय सेना जब चीन सेना से बातचीत करने पहुंची , उसी समय चीन के सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर अचानक हमला बोल दिया । चीन द्वारा किए गए इस अप्रत्याशित हमले में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए और 43 सैनिक चीन के भी हताहत हुए। इस हमले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें कोई गोला बारूद या सैन्य हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ ,वरन दोनों तरफ से लाठी डंडे के साथ-साथ पथराव भी किया गया है। चीनी सैन्य बल ने भारतीय सैनिकों पर राड से भी हमला किया। गलवान घाटी में चीनी सैनिकों एवं भारतीय सैनिकों के मध्य हुए लगभग 3 घंटे तक इस खूनी संघर्ष में दोनों तरफ से सैनिक हताहत हुए। 45 साल बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सैनिकों एवं चीनी सैनिकों के बीच यह भिड़ंत हुई। चीन शीर्ष स्तर पर हुए समझौते का पालन करता तो इस झड़प से बचा जा सकता था। यहां यह बताना जरूरी है कि बीते 15 जून को देर रात चीन ने जब भारतीय सेना पर हमला किया तो भारत ने भी उसका मुंहतोड़ जवाब दिया।यह दुखद है की इस हिंसक झड़प में दोनों तरफ के सैनिक हताहत हुए। इतना सब होने के बावजूद भी दोनों देशों के मध्य सैनिक एवं कूटनीतिक स्तर पर बातचीत का दौर अभी भी जारी है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भारत को चौकन्ना रहने की जरूरत है ,क्योंकि 1962 के युद्ध में चीन ने हमें विश्वास में लेकर हमारे साथ विश्वासघात किया था। उस घटना को सबक लेते हुए चीन पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। हाल ही में हुई बीते दिनों की घटना इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है । क्योंकि गलवान घाटी में बीते दिनों जो घटना घटित हुई वह चीन की एक सुनियोजित रणनीतिक साजिश थी। अब तक हुए घटनाक्रम को देखते हुए भारत ने अपनी तीनों सेनाओं को एलर्ट कर दिया है तथा साथ ही साथ लद्दाख के अलावा अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड ,हिमाचल प्रदेश तथा सिक्किम से लगी सीमा पर भी सैनिकों को सतर्क कर दिया गया है। इतना ही नहीं भारत देश की सीमा पर 180 से अधिक सीमा चौकी को भी एलर्ट कर दिया है। भारत किसी भी स्थिति से निपटने के लिए इस बार पूरी तरह से तैयार है। भारत 1962 में हुई अपनी भूल को दोबारा दोहराना नहीं चाहता। इसी बीच दोनों देशों के मध्य विदेशमंत्री स्तर पर हुई बातचीत के बाद दोनों पक्ष तनाव कम करने को लेकर आपसी सहमति व्यक्त किया है। इसके साथ ही साथ दोनों देश इस बात पर सहमत हुए हैं कि 6 जून को सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता में बनी सहमति पर आगे बढ़ेंगे तथा नियंत्रण रेखा का दोनों देश की सेना सम्मान करेगी और बदले की कार्रवाई नहीं करेगी।
भारतीय विदेश नीति की यदि बात करें तो इतिहास गवाह है जब से हमारे यहां लोकतंत्र स्थापित हुआ है हमने किसी भी देश पर पहले आक्रमण नहीं किया ,लेकिन जब हम पर कोई आक्रमण किया तो हम उसका माकूल जवाब देने में पीछे नहीं हटे। हम अपनी क्षेत्रीय अखंडता
एवं संपदा की रक्षा करने में पूर्णतया सक्षम है। हमारा देश बुद्ध का देश है युद्ध का नहीं, लेकिन फिर भी हम अपने पहले आक्रमण न करने की नीति पर आज भी कायम हैं साथ ही साथ यदि आगे हम पर चीन उकसाने वाली कार्रवाई करेगा तो हम उसका उपयुक्त जवाब देंगे ।