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गलगोटिया विश्वविद्यालय का ‘ओरियन’ निकला फर्जी, इंडिया ए आई समिट में भारत की पिट गई भद्द

जनवाद टाइम्स 20 February 2026
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डॉ धर्मेन्द्र कुमार
जसवंत नगर । हम विश्व गुरु बनने ही वाले थे कि चीनी कुत्ते ने ए आई समिट में देश की इज़्ज़त कुत्ते से भी बदतर कर दी।पिछले दो दिन से इंडिया ए आई समिट में रोबोटिक डॉग विशेष चर्चा का केंद्र रहा।

यह बात गैर है कि विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नेहा सिंह ने मीडिया को बताया कि यह हमारी यूनिवर्सिटी में डेवलप किया गया ‘ओरियन’ है। जिस पर लगभग 300 करोड़ का खर्चा आया है।

दरसल थोड़ी सी चूक हो गई नहीं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र दास मोदी तथा केंद्रीय मंत्री अश्वनी वैष्णव के साथ पूरी तरह भाजपा और मीडिया यह कहते नहीं थकते कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में ओरियन को जन्म दे दिया है, जो भविष्य में राम, श्याम जपते हुए पूरे देश का उद्धार कर देगा। अब पाकिस्तान बहुत पीछे रह गया। हम विश्व गुरु बन गये।

दरसल गलगोटिया विश्वविद्यालय ने उस रोबोटिक कुत्ते का नामकरण बहुत सोच समझकर ओरियन किया। क्योंकि ‘ओरियन का हिंदी अर्थ मृग, काल पुरुष, शिकारी, तारामंडल का नक्षत्र अथवा उदय होता हुआ प्रकाश ‘होता है।

किंतु यह बात गैर है कि उसे चीन से आयात किया गया जिसका नामकरण चीन ने पहले ही ‘यूनिट्री गो 2‘ रख दिया था।जिसकी बाजरू कीमत लगभग 2 लाख रुपया है। जिसे 2016 में स्थापित ‘हांगजो युशु टेक्नोलॉजी कंपनी लिमिटेड‘ द्वारा तैयार किया गया था। यह कंपनी उपभोक्ता केंद्रित कुत्तों और बुद्धिमत्ता में विशेषज्ञता रखती है।

इस कंपनी का मुख्यालय हांगजो चीन में है. किंतु गलगोटिया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नेहा सिंह द्वारा उसे अपने विश्वविद्यालय का dovelop (विकसित) बताकर खूब जग हँसाई करवा दी। इसकी जिम्मेदारी में गलगोटिया प्रशासन द्वारा खुद की गलती न बता कर नेहा सिंह को अल्प ज्ञानी अति उत्साही बताकर माफी मांग ली।

दिल्ली के एक प्रकाशक धर्मेंद्र गलगोटिया के पुत्र सुनील गलगोटिया ने 1980 के दशक में पब्लिकेशन के क्षेत्र में एक नई पहचान बनाई तदोपरांत 2000 के आसपास ग्रेटर नोएडा में गलगोटिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट की स्थापना की जिसका विस्तार करते हुए 2011 में गलगोटिया विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।

संस्थान को शिक्षा जगत का रोजगार उन्मुख, बेहतरीन शिक्षा, अन्य विषयों में छात्रों के करियर बनाने में गलगोटिया ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर ली। और NAAC में भी शानदार ग्रेड अर्जित की। वर्तमान में सुनील गलगोटिया के पुत्र डॉ ध्रुव गलगोटिया सीईओ हैं। जिनके निर्देशन में विश्वविद्यालय ए आई समिट में प्रतिभाग करने पंहुचा। ताकि विश्व विद्यालय अपने नवाचार का बेहतर प्रदर्शन कर सरकार और आम जनता का दिल जीत सके।

गुणवत्ता के बजाय प्रचार तंत्र के माध्यम से समाज में अपनी मजबूत पकड़ बनाने वाले गलगोटिया विश्वविद्यालय से सरकार के कनेक्शन को जोड़कर देखना न्यायोचित होगा क्योंकि विश्वविद्यालय लगातार तरक्की की राह पर अग्रसर है जिसके पीछे उसका इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी आशीर्वाद।

क्योंकि सरकार की मंशानुरूप विपक्ष और आम जनता के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए गलगोटिया विश्वविद्यालय के छात्र सरकार की मनसा अनुरूप उपलब्ध कराए जाते रहे हैं जिसका उदाहरण 2024 का छात्र /छात्राओं द्वारा किया गया प्रदर्शन है। जिसमें यहां के छात्र-छात्राओं ने भारतीय कांग्रेस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था, जिनके हाथों में पट्टीकाएं थी उनकी योग्यता तब पता चली जब वे छात्र पत्तिकाओं पर लिखे शब्द भी ठीक से नहीं पढ़ पा रहे थे। प्रेस के पूछने पर छात्र और छात्राओं ने यह भी बताया था कि उन्हें नहीं मालूम कि वह क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं? बस उनका कहना था कि वह तो विश्वविद्यालय के आदेश का पालन कर विरोध प्रदर्शन कर रहे।

वर्ष 2026 में इंडियन ए आई समिट में चीनी रोबोटिक डॉग यूनिट्री गो 2 को अपने स्टाल पर रखकर खूबियां गिनाते हुए प्रोफेसर नेहा सिंह ने फर्राटेदार अंग्रेजी में बताया कि यह  ओरियन हमारे विश्वविद्यालय में विकसित किया गया। जब पोल खुली तो फिर वही प्रोफेसर अंग्रेजी हिंदी अंग्रेजी हिंदी हिंदी अंग्रेजी में पटर पटर कर कहती देखी गई कि मुझे मीडिया जगत ने ठीक से नहीं समझ पाया कि वह डेवलप नहीं डेवलपिंग है। मतलब पहले इसी डॉग को ओरियन बताकर इस पर आये खर्च को 300 करोड़ बताया। अब जब चीन से आयात यूनिट्री गो 2 निकला तो इसकी कीमत 2 लाख का रह गई।

मतलब साफ था कि 300 करोड़ रूपया विश्व विद्यालय की बैलेंस सीट में दिखाकर काला सफेद कर दिया जाएगा। यही मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और विश्व गुरूजी बनने की सच्चाई है। जिसमे प्रेस और देश वासी अनजान है कि देश और देश वासियों को कैसे चूना लगाया जाता है।

गलगोटिया विश्वविद्यालय के एक और सरकार समर्थित काले कारनामे से परिचित कराना भी जागरूक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है। सरकार समर्थक यह वही विश्वविद्यालय है जिसने 2020 में कोरोनावायरस पर सरकारी चापलूसी करते हुए मोदी की तारीफ में एक शोध पत्र ” Corona virus killed by sound vibration produced by Thali or Ghanti : A potential hypothesis. अर्थात् (थाली या घंटी से उत्पन्न ध्वनि कंपन द्वारा कोरोना वायरस का नाश: एक संभावित परिकल्पना)’ शीर्षक से प्रकाशित किया। जब चिकित्सा जगत एवं अंतर्राष्ट्रीय जगत में गलगोटिया विश्वविद्यालय की किरकिरी हुई तब गलगोटिया विश्व विद्यालय ने अपने शोध पत्र को स्वयं (रिट्रेक्ट) अर्थात वापस ले लिया, निरस्त कर दिया अथवा खारिज कर दिया।

किंतु वर्तमान घटनाक्रम ओरियन का चीनी मूल का होने के बाद सोशल मीडिया पर हसीं मज़ाक की बाढ़ आ गई। अश्वनी वैष्णव ने अपना ट्वीट निरस्त कर दिया। यह जागरूकता नहीं पागलपन है।

सच्चाई अगर देखनी है किसी भी विश्व विद्यालय में उनके यहां छात्रों के अनुपात में अध्यापकों की सूची गेट पर चस्पा करा कर देखो। आपको 70 फीसदी अध्यापकों के सिर्फ अनुमोदन मिलेंगे. जिसमें कुछ को नाममात्र के पैसे मिल रहे होंगे। और कुछ को धेला भी नहीं। मज़ाक इसकी बनाओ कि पढ़ाई बिना प्रोफेसर के कैसे?

प्रत्येक कक्षा में जमा अब तक के रिसर्च प्रोजेक्ट का मूल्यांकन करवा कर देखो 100 फीस दी रिसर्च प्रोजेक्ट नेट से कट, कॉपी, पेस्ट मिलेंगे? मज़ाक इस पर बनाओ कि शोध परियोजना अब कैसी होने लगी? प्रत्येक कक्षा की अंक प्रदान करने वाली अंक सूची के हिसाब से कॉपियां पुनः चेक कराओ फिर पूछो कुछ भी लिखो नंबर सैकड़ा पार होने की दिशा में कैसे? इनके /उनके या सबके यहां अब तक हुए शोध प्रबंध चेक कराओ जिसमें पुराने शोध प्रबंध के शब्द बदलकर और साहित्य चोरी रिपोर्ट की रिपोर्ट छिपाने के लिए प्लीजग्रिम रिपोर्ट 10 प्रतिशत के नीचे रखकर कैसे जमा किया जाता है? प्रश्न करो? समस्या को जन आंदोलन बनाओ नहीं देश ऐसा विश्व गुरु बनेगा जिस गुरु पर कोई विश्वास नहीं करेगा।क्योंकि सभी विश्वविद्यालय इसी तरह का एक गोल-गोल खेल रहे हैं।

विश्वविद्यालय इसे नवाचार कह रहे हैं तो सरकार और सरकारी चाटुकार इसे NEP 2020 की अपार सफलता तथा राष्ट्रीय प्रगति बताकर जनता को गुमराह कर रही है।

काली सच्चाई यह है की बस कुछ एकाध लफंगे जिन्हें इंग्लिश स्पीकिंग का अच्छा अनुभव है उन्हें हर विश्वविद्यालय मंच प्रदान करता है। ताकि विश्वविद्यालय के नाम और प्रगति पर वह लगातार कसीदे काढ़ सकें और जनता उनकी बात को समझ ना सके। साथ ही बंद सेशन खींचे गए फोटो आकर्षित करने के लिए आम जनमानस को दिखाकर विश्वविद्यालय और अधिक आम जनमानस के बच्चों को अपनी ठगी की ओर आकर्षित कर सकें। जबकि धरातल पर इसका अध्ययन करें तो सब जगह शून्य दिखाई देता है। यह एक बार की ए आई समिति के बीच हमारी /देश की फज़ीहत नहीं बल्कि आप जहां भी जाएंगे ऐसी ही फज़ीहत आपका पीछा नहीं छोड़ेगी।
‘चीन के कुत्ते ने अंतराष्ट्रीय जगत हमारी इज़्ज़त कुत्ते से बदतर कर दी।‘ गलगोटिया तेरा लाख dhnyva ।

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