प्यासी मीन :जया मोहन प्रयागराज

किसी किसी के नसीब में फूल कम और काँटे ज्यादा होते है।कहते है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है वैसे ही कुछ के जीवन मे गर्दिश के अंधेरे हमेशा उनका पीछा करते है।महजबीन का भाग्य भी ऐसा ही था।पैदा होने के बाद माता पिता के पास पैसों का इतना अभाव था कि वो उसे यतीमखाने के द्वार पर छोड़ आये पर बच्ची के रुदन ने उन्हें व्यथित कर दिया वह उसे उठा लाये।इस बच्ची ने सात वर्ष की उम्र में फ़रज़न्द हिन्द नाम की फ़िल्म कर माता पिता की आर्थिक मदद की। सबको प्यार देने वाली खुद प्यार को तरसती रही।जी हॉ मैं बात कर रही हूं उस मशहूर अदाकारा की जिसे लोग मीनाकुमारी के नाम से जानते हैं। दौलत शोहरत तो खुद ने नसीब में लिखी पर जीवन के गुलशन को महकाने वाले प्यार को लिखना भूल गए।वह पहली एक्ट्रेस थी जिन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया था।कमाल अमरोही से विवाह फिर तलाक व धर्मेन्द्र से प्यार की उपेक्षा ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया।जो प्यार के सागर में डूबना चाहती थी वो मय के प्यालो में डूब गई अपने दुखों से पीछा छुड़ाने के लिए।
परिणाम दुखद हुआ वो गंभीर बीमारी से घिर गई।
31 मार्च 1972 को इस अदाकारा ने अपनी जीवन यात्रा विश्राम दे अनन्त क्षितिज की तारा बन गयी
प्रसंशको से अपनो के होने के बाद भी मृत्यु के बाद इतना पैसा नही था कि अस्प्ताल का बिल भरा जा सके उनके एक प्रसंशक डॉक्टर ने बिल भर।अगर अपनो ने प्यार दिया होता तो सिने जगत ने असमय इस अदाकारा को न खोया होता।।
दर्द में डूबी उन्ही की नज़्म जो तन्हाई के रिसते घावों को बता रही है
चाँद तन्हा है आसमान तन्हा
दिल मिला कहां तन्हा
राह देखा करेगा ज़माना
सदियों तक
छोड़ जायेगे ये जहॉ तन्हा
ईस्वर उन्हें अपना असीम प्यार दे कर प्यासी मीन की रूह को सुकून अता फरमाए
स्वरचित : जया मोहन
प्रयागराज
29,04,2020