लेखक: डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार
इटावा: भिकू धोत्रे एवं माता रुक्मणी के घर 7 फरवरी 1898 बड़द गांव रत्नागिरी मैं रमाबाई का जन्म हुआ l बचपन में पहले माता और बाद में पिता इहलोक की यात्रा समाप्त कर परलोक सिधार गए तब रमाबाई की बहन गौरा, भाई शंकर धोत्रे के पालन पोषण की जिम्मेदारी उनके चाचा बलंगकर और मामा गोविंदपुरकर ने निभाई lधोत्रे को बनकर नाम से भी पुकारते थे l भिकू धोत्रे दाभोल बंदरगाह में नौकरी करते थे अब शंकर धोत्रे मुद्रणालय में नौकरी करने लगे थे l भीमराव ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की महार जाति में मैट्रिक पास करना एक ऐतिहासिक घटना थी इस उपलक्ष्य में एक समारोह आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता महाराष्ट्र के क्रियाशील सुधारक केशव बोले ने की थी l भीम के पिता सूबेदार रामजी ने रमाबाई के साथ भीमराव का विवाह तय किया अप्रैल 1906 में मुंबई के भाईखाले का मछली बाजार विवाह कार्यक्रम हेतु निश्चित हुआ l विवाह स्थल पर एक तरफ छप्पर में बराती दूसरी ओर छप्पर में घराती तथा चबूतरे का प्रयोग बेंच के रूप में किया गया l सुबह बाजार में मछली बेचने वाली महिलाओं के आने से पहले विवाह उत्सव संपन्न होकर बराती वापस चले गए l विवाह के समय भीमराव की उम्र 17 वर्ष तथा रमाबाई की उम्र 9 वर्ष थी l वह अत्यंत सुशील शांत स्वभाव की कर्तव्यनिष्ठ महिला थी l उन्होंने जीवन भर डॉक्टर अंबेडकर का हमेशा साथ दिया l परिवार का बोझ सिर पर रख उपले बेचने में उन्होंने हिचक महसूस नहीं की l डॉक्टर अंबेडकर की विलायत की शिक्षा माता रमाबाई की खातिर पूर्ण हो सकी l इलाज के अभाव में उन्होंने अपने चार बच्चों की कुर्बानी दी l किंतु डॉक्टर अंबेडकर को विचलित नहीं होने दिया l अंत में वह दुख की घड़ी भी आ गई जब माता रमाबाई अत्यंत कमजोर बीमार हो गई l यशवंतराव मां के पास था विलायत से आने पर डॉक्टर अंबेडकर ने यशवंतराव से पूछा तुम्हारी मां अब कैसी हैं? यशवंतराव ने कहा कि मां आपकी बहुत याद करती हैं l डॉक्टरों ने उनकी हालत देख कर मना कर दिया है और यशवंतराव रोने लगा l डॉक्टर अंबेडकर ने यशवंतराव को तसल्ली देते हुए कहा कि अब मैं आ गया हूं सब ठीक हो जाएगा l रमाबाई से मिलने के बाद डॉक्टर अंबेडकर चिकित्सक को लाने के लिए तैयार हुए तभी रमाबाई ने दुखी स्वर में कहा अब डॉक्टर को लाने की कोई आवश्यकता नहीं है मैं अत्यधिक कमजोर हो गई हूं मुझे किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता l आए हो तो मेरे पास बैठ जाओ न जाने मैं कब से आपकी राह देख रही हूं l मेरा अंतिम समय निकट है डॉक्टर अंबेडकर ने आंसू रोक कर कहा तुम चिंता मत करो यशवंत की मां तुम ठीक हो जाओगे l किंतु रमाबाई ने कराहते हुए कहा अब कुछ नहीं हो सकता और डॉक्टर अंबेडकर के हाथों को पकड़ लिया और कहा मेरी एक बात ध्यान से सुनो -तब डॉक्टर अंबेडकर रमाबाई के रुग्ण चेहरे की ओर निहारने लगे l रमाबाई ने कहा यशवंतराव मेरे कलेजे का टुकड़ा है मेरे मरने के बाद आप इसकी देखरेख ठीक से करना l डॉक्टर अंबेडकर ने आंसुओं की धारा में रमाबाई को यह बचन दिया l पुनः रमाबाई ने कहा आपने अछूतों के उद्धार के लिए जो संकल्प लिया है उसे पूर्ण करना l इससे मेरी आत्मा को शांति मिलेगी l कभी अपने कार्य से पीछे मत हटना यह काम तुम को हर हालत में करना है l डॉक्टर अंबेडकर ने कहा प्रिए वह संकल्प लगभग पूरा हो चुका है ,आज ही महात्मा गांधी से मेरा समझौता हुआ l डॉक्टर अंबेडकर ने अपने घुटने पर रमाबाई का सिर रखकर अत्यंत दुखी हुए वह रौंधे कंठ से बोले दलित वर्ग के लिए मैंने जो कुछ चाहा था वह सब कर लिया उन्हें आरक्षण के साथ सरकारी नौकरी भी मिलेगी l रमा तुमने बड़ा त्याग किया है मुझे उच्च शिक्षा दिलाने में तुम्हारी हौसला अफजाई मेरे हमेशा साथ रही ,अब अच्छा समय आ गया है और तुम मुझे छोड़ कर जा रही हो l क्या तुम्हें दलितों का उद्धार होते अपनी आंखों से नहीं देखना है वह फफक कर रोने लगे l रमाबाई ने कहा आदमी जो चाहता है वह नहीं होता हैl मेरा सपना था कि दलितों का उद्धार अपनी आंखों से देखूं लेकिन शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था l 27 मई 1935 को यह शब्द उनके आखिरी शब्द थे और परलोक सिधार गई l डॉक्टर अंबेडकर ने रोते-रोते अंतिम संस्कार किया l धन्य हो देवी तुम्हें स्वर्ग के समस्त सुख प्राप्त हो l तुम्हारा योगदान अविस्मरणीय है l हम महान त्याग की महान देवी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं l