संवाददाता मोहन सिंह
बेतिया /पश्चिमी चंपारण।
साहित्य की भूमि पश्चिम चम्पारण ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि कलम की शक्ति प्रशासन और समाज सेवा के साथ भी गहरे तालमेल में आगे बढ़ सकती है। इसका जीवंत उदाहरण तब देखने को मिला जब चन्दन कुमार झा द्वारा रचित काव्य-संग्रह “उत्तर देता मौन” का भव्य लोकार्पण समारोह होटल सिद्धार्थ, बेतिया में संपन्न हुआ। दो सत्रों में विभाजित इस आयोजन ने साहित्य, प्रशासन और सामाजिक चेतना का दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया।
लोकार्पण एक भावपूर्ण संवाद बना
समारोह का पहला सत्र पुस्तक के लोकार्पण को समर्पित था, जहां पश्चिम चम्पारण के जिलाधिकारी दिनेश कुमार राय ने पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि “शब्दों से परे जो मौन है, वही जीवन का सबसे सशक्त उत्तर है।” उन्होंने लेखक की लेखनी को “विवेक और संवेदना का मेल” बताया। उन्होंने भगवान बुद्ध से जुड़ी एक कहानी को बताते हुए मौन किस प्रकार से सभी प्रश्नों का उत्तर दे सकता है को स्रोताओं को बताया। उन्होंने कहा कि पुस्तक का शीर्षक काफी पारदर्शी है। इससे प्रेरणा मिलती है कि मन में उठने वाले हजारों प्रश्न का उत्तर एक मौन से दिया जा सकता है। उन्होंने प्रशासनिक कार्यों की व्यस्तता के बीच साहित्यिक सृजन करने वाले श्री चन्दन कुमार झा के बारे में बताया कि ये समाहरणालय में कार्यरत हैं लेकिन तमाम व्यस्ताओं के बीच भी साहित्य का सृजन कर रहे हैं, ये अनुकरणीय है। उन्होंने पुस्तक के बारे में बताया कि इस किताब में प्रेम को केंद्रित रखते हुए अच्छी कविताएं लिखी गईं हैं। वहीं समसामयिक और संवेदनशील विषयों पर भी मार्मिक कविताएं लिखी गईं हैं। उन्होंने चन्दन झा को भविष्य के लिए अग्रिम बधाई दी।

लोकार्पण मंच पर राजीव कुमार सिंह (अपर समाहर्ता), कुमार रविन्द्र, अपर समाहर्ता विभागीय जांच, अनिल कुमार सिन्हा, अपर समाहर्ता लोक शिकायत, बिनोद कुमार, अनुमंडल पदाधिकारी, बेतिया सदर , सुजीत कुमार, जिला पदाधिकारी के ओ एस डी सहित कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे, जिन्होंने लेखक की साहित्यिक दृष्टि और सामाजिक प्रतिबद्धता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
लोकार्पण सत्र के प्रारंभ में डॉ किशोर आनंद, उप निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण के द्वारा कविता मंचन करते हुए कार्यक्रम की रूप-रेखा और किताब के प्रकाशन की यात्रा पर प्रकाश डाला।
कविता और विवेक का समन्वय
डॉ परमेश्वर भक्त के द्वारा पुस्तक के संदर्भ में अपने विचार प्रकट करते हुए लेखक को बधाई दी। कार्यक्रम के संयोजक डॉ संजय कुमार यादव ने लेखक के भीतर छिपे संवेदनशील मनुष्य को उजागर करते हुए बताया कि “चन्दन झा का मौन, केवल मौन नहीं — आत्मचिंतन की एक जीवंत प्रक्रिया है।” डॉ विनय कुमार सिंह ने उत्तर देता मौन को समकालीन हिन्दी कविता के परिप्रेक्ष्य में रखते हुए इसकी शैली और अभिव्यक्ति की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की। जिला नाजिर और साहित्यकार जय किशोर जय के द्वारा अपनी एक कविता के माध्यम से पुस्तक पर विचार प्रकट किया गया।
कैवल्य प्रकाशन के प्रकाशक अंकित देव अर्पण ने बताया कि यह पुस्तक न केवल पाठकों को भीतर तक छूती है, बल्कि उन्हें अपने मौन से भी संवाद करना सिखाती है। यह संग्रह 50 से अधिक कविताओं का संकलन है, जिसमें जीवन, संघर्ष, प्रेम, आत्मचिंतन और समकालीन विसंगतियों की अनुभूत झलक मिलती है।
द्वितीय सत्र: कविता गोष्ठी में बही संवेदना की धारा
कार्यक्रम का दूसरा सत्र कविता गोष्ठी को समर्पित रहा, जिसकी अध्यक्षता डॉ परमेश्वर भक्त ने की। इस सत्र में मंच पर खुशबू मिश्रा, शालिनी रंजन, डॉ ज़फर इमाम ज़फर, डॉ गोरख मस्ताना, अरुण गोपाल, सत्येंद्र गोविंद, चंद्रिका राम, प्रशांत सौरभ, प्रफुल्ल तिवारी सहित अनेक कवियों ने भावपूर्ण कविताएँ प्रस्तुत कीं।
इस सत्र की विशेषता यह रही कि यह गोष्ठी केवल कविता पाठ नहीं, बल्कि कवि और श्रोता के बीच संवेदना के आदान-प्रदान का माध्यम बनी। कई रचनाएँ श्रोताओं को मौन की शक्ति और शब्दों की मर्यादा पर पुनः विचार करने के लिए प्रेरित करती रहीं।
क्षण भर को थमा समय, जब कविता ने मौन से बात की
यह आयोजन “क्षितिज – साहित्यिक-सांस्कृतिक वितान” के तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसने एक बार फिर यह प्रमाणित किया कि बेतिया जैसे नगरों में साहित्यिक चेतना कितनी सशक्त और जीवंत है। डॉ किशोर आनंद, जय किशोर जय, ज्योति शंकर गिरी सहित कई सक्रिय साहित्य-सेवियों की उपस्थिति ने आयोजन को स्मरणीय बना दिया।
कार्यक्रम के अंत में लेखक चन्दन कुमार झा ने कहा — “यह पुस्तक मेरे भीतर के मौन की यात्रा है, जो कभी संवाद बनकर फूटी, कभी अश्रु बनकर बही। यदि पाठक इसमें अपना मौन पहचान पाएं, तो यही मेरा सृजन सार्थक है।”
एक निष्कर्ष : जब शब्द मौन को सुनते हैं…
“उत्तर देता मौन” केवल एक काव्य संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई का रेखांकन है — कि अब शब्दों के कोलाहल में मौन ही सच्चा उत्तर है। यह आयोजन उस मौन की सार्वजनिक उद्घोषणा था, जिसमें कविता ने समाज से कहा — “मैं अब भी बोलती हूँ, भले ही चुप हूँ।”