आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच संवाद पर गंभीर विमर्श
डॉ. प्रमोद कुमार ने AI को मानवीय मूल्यों के अधीन विकसित करने की आवश्यकता पर दिया जोर
इक्कीसवीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) केवल तकनीकी नवाचार नहीं रह गई है, बल्कि यह मानव चेतना, संवाद, ज्ञान-निर्माण और नैतिकता के नए प्रतिमान गढ़ रही है। इसी संदर्भ में डॉ. प्रमोद कुमार ने “कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर एक विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत करते हुए कहा कि AI और भारतीय दर्शन का संबंध टकराव का नहीं, बल्कि संतुलन और समन्वय का है।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हजारों वर्षों से संवाद, तर्क, आत्मबोध, नैतिक अनुशासन और सामूहिक प्रज्ञा पर आधारित रही है। वेदों, उपनिषदों, बौद्ध और जैन परंपराओं में प्रश्न-उत्तर, शास्त्रार्थ और विमर्श को ज्ञान का मूल आधार माना गया है। इसके विपरीत, आधुनिक AI संवाद तो करता है, लेकिन वह अनुभवजन्य चेतना और आत्मानुभूति से रहित होता है।
डॉ. प्रमोद कुमार ने भारतीय दर्शन में ज्ञान के तीन स्रोत—प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द—का उल्लेख करते हुए कहा कि AI मुख्यतः अनुमान और शब्द पर आधारित है, जबकि प्रत्यक्ष अनुभव मशीन के लिए संभव नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसलिए AI को ज्ञान का साधन माना जाना चाहिए, स्वयं ज्ञान नहीं।
नैतिकता के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नैतिकता केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और आत्मशुद्धि का मार्ग है। यदि AI के विकास में नैतिकता को केवल औपचारिक गाइडलाइंस तक सीमित रखा गया, तो वह सामाजिक न्याय, समता और करुणा जैसे मूल्यों को नुकसान पहुँचा सकती है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि AI-संचालित सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म संवाद को तेज़ तो बना रहे हैं, लेकिन साथ ही ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार और सूचना-आधारित हिंसा को भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय ‘शास्त्रार्थ’ परंपरा हमें सिखाती है कि संवाद का उद्देश्य विजय नहीं, बल्कि सत्य की खोज होना चाहिए।
सामूहिक प्रज्ञा की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव केवल बहुमत नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण सहमति की बात करता है। नीति-निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय जैसे क्षेत्रों में AI के उपयोग के दौरान इस नैतिक सामूहिकता को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
पर्यावरण, शिक्षा और आत्मचिंतन के संदर्भ में भी उन्होंने AI के संतुलित उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना है कि यदि AI मानवता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के लिए प्रयुक्त होती है, तो यह आधुनिक युग का एक सशक्त साधन बन सकती है।
अंत में डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि वही आत्मसंयम, विवेक और करुणा का मार्ग दिखा सकती है। तकनीक और परंपरा के इस समन्वय से ही एक न्यायपूर्ण, संवादात्मक और प्रज्ञामय समाज का निर्माण संभव है।